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भगवान महावीर और उनका जीवन-दर्शन

Mahaveerजैनधर्म के इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव के पौत्र मारीचि से लेकर अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के भव तक की जीवन यात्रा किसी आत्मा के अपने मिथ्या अहंकार एवं अज्ञान जनित विकारी वृत्तियों के फल में संसार परिभ्रमण की तथा उससे मुक्ति की विचित्र ही कथा है। करोड़ों करोड़ों भव विभिन्न योनियों में बिताने के बाद महावीर के अन्तिम भव से पूर्व के दसवें भव में सिंह की योनि में उन्हें चारण ऋद्धिधारी मुनियों से आत्महित प्रेरक उद्बोधन मिला और उस सिंह योनि से भगवान महावीर के आत्मा की विकास यात्रा प्रारम्भ हुई। अन्तिम भव में वैशाली गणतन्त्र के कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ व महारानी प्रियकारिणी त्रिशला के घर में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान के रूप में उस पवित्र आत्मा ने जन्म लिया। जैसा कि सभी तीर्थंकरों के जीवन में होता है उनके भी गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान व मोक्ष कल्याणक देवों व मानवों के द्वारा अति उत्साह व भक्ति से मनाये गये। हो भी क्यों नहीं? जब सामान्य व्यक्ति के जीवन में भी उत्सवों की कमी नहीं होती तो उन महापुरूष के जीवन की मुख्य घटनाओं पर उत्सव होना स्वाभाविक ही है क्योंकि वे इस युग के अन्तिम तीर्थंकर थे और भविष्य में मुक्ति मार्ग उनके उपदेशों से ही जीवित रहना था।

सभी जानते हैं कि ३० वर्ष की आयु में उन्होंने राजपाट त्याग कर श्रमण साधना का मार्ग अंगीकार किया। १२ वर्ष तक कठोर एवं मौन तपश्चरण के बाद ४२ वर्ष की आयु में उन्हें केवलज्ञान (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई और इस प्रकार वे अपने सम्पूर्ण ही राग-द्वेषादि विकारों का अभाव कर अर्हन्त परमात्मा बन गये। उनके उपदेशों का क्रम उसके बाद अनवरत ३० वर्ष तक चलता रहा और कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन की प्रात: बेला में उन्होंने संसार चक्र से मुक्ति प्राप्त की और सिद्ध हो गये। सिद्ध दशा एक ऐसी दशा है जहां से आत्मा कभी लौट कर संसार में नहीं आता, अनन्त भविष्य काल में वह अपने आत्मिक आनन्द का उपभोग करता रहता है। यह वैसे ही है जैसे कि शुद्ध स्वर्ण पिण्ड स्वयमेव कभी अशुद्ध नहीं होता।

भगवान महावीर का यह जीवन और उनकी शिक्षाएं भी जगत के सभी प्राणियों के लिये अत्यन्त प्रेरणादायक एवं जागतिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं।

भगवान महावीर की शिक्षाएं सर्व कल्याण कारी हैं, सर्वोदयी हैं। उनके अनुपालन से न केवल जीवों का मुक्ति का मार्ग ही प्रशस्त होता है वरन् सामान्य लोक जीवन भी सुन्दर हो जाता है। उनके उपदेशों में सामान्यतया अहिंसा, अनेकान्त व स्याद्वाद, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सत्य व अचौर्य की चर्चा की जाती है। परन्तु उनके उपदेशों का जो लोकोत्तर पहलू है, वह है पदार्थ की अनन्त गुण सम्पन्नता, परिणमन (अवस्था परिवर्तन) की स्वतन्त्रता, पर द्रव्यों के कर्तृत्व का अभाव और प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति व सामर्थ्य की घोषणा।

भगवान महावीर का मारीचि से लेकर वर्तमान भव तक का जीवन वस्तु स्वरूप की स्वतन्त्रता तथा निमित्तों की अकिंचित्करता (कार्य में अकारणता) की घोषणा करता है। उन्होंने कहा कि जगत की सभी आत्माएं समान हैं और अपने विकारों का अभाव कर पूर्ण शुद्ध स्वरूप को प्रगट करने में समर्थ हैं। उन्होंने कहा कि आत्मा स्वभाव से अनन्त ज्ञान दर्शनादि शक्तियों से परिपूर्ण है, वह आनन्द मय है, आनन्द का कोष है उसे आनन्द कहीं से लाना नहीं पड़ता। जैसे ही आत्मा पर द्रव्यों से दृष्टि हटाकर अपने ज्ञान को निज आत्म केन्द्रित करता है उसे अतीन्द्रिय निर्विकल्प आनन्द की अनुभूति होती है। उसे अपने सुख के लिये कहीं बाहर तलाशने की आवश्यकता ही नहीं है। और इस आत्मानुभूति के साथ ही मुक्ति के मार्ग का प्रारम्भ हो जाता है।

इस मुक्ति के मार्ग का प्रारम्भ स्वयं की आत्म सत्ता की पूर्णता के स्वीकार के साथ ही होता है क्योंकि जब तक आत्मा स्वयं को अपूर्ण मानता रहेगा तब तक बाहरी पदार्थों से अपना हित अहित मानते रहने के कारण इष्ट के संग्रह और अनिष्ट के त्याग के निरर्थक प्रयत्नों में ही लगा रहेगा तथा पदार्थों का मनोनुकूल संग्रह व त्याग अशक्य होने से निरन्तर आकुलित ही रहेगा।

इसलिये भगवान महावीर ने इस बात पर सर्वाधिक बल दिया कि आत्मा ही नहीं जगत का प्रत्येक ही द्रव्य स्वयं पूर्ण, परनिरपेक्ष व स्वतन्त्र है तथा जो विकार हमें अज्ञानजनित राग-द्वेष मोहादिक के रूप में आत्मा में नजर आता है वह भी उसका स्वभाव नहीं है, यह विकार स्वभाव के ऊपर-ऊपर ही रहता है। इसीलिये आत्मा का स्वभाव उससे अप्रभावित शुद्ध ही पड़ा रहता है, इसी कारण अनन्त जागतिक प्रतिकूलताओं के बीच भी आत्म स्वभाव अक्षुण्ण रहता है। अनन्त भूतकाल की विषमतम परिस्थितियों में भी यदि आत्मा अपने अस्तित्व रूप से सदा विद्यमान रहता आया है तो यह आत्मा की अनन्त गुणात्मकता के बिना संभव नहीं हो सकता।

विकारों की अनादि श्रृंखला के मध्य आत्मा किस प्रकार शुद्ध रह सकता है यह एक स्वाभाविक प्रश्न है।

एक सिंह शावक की कहानी से तो सभी परिचित होंगे ही कि किस प्रकार वह अपने परिवार से बिछुड़कर भेड़ों के झुण्ड में चला गया और भेड़ों के साथ ही रहते हुये तथा स्वयं को उन जैसा ही समझते हुये बड़ा होने लगा। एक दिन नदी किनारे पानी पीते हुये उसे दूसरे किनारे पर खड़े हुये एक सिंह ने देखा और वह उस सिंह शावक को भेड़ों के झुण्ड के साथ देखकर चकित रह गया। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि यह सिंह शावक गलती से ही भेड़ों के साथ चला गया है और अपने स्वरूप एवं सामर्थ्य को भी भूल गया है। हम जानते हैं कि सिंह ने बाद में शावक के पास जाकर उसे अपना व स्वयं का स्वरूप नदी के पानी में परछांई के रूप में दिखाया, तब सिंह शावक तुरन्त ही यह समझ गया कि वह भेड़ों की जाति का नहीं है, अपने हितैषी उस सिंह की जाति का है। और इस विश्वास के साथ ही जब उसने पूरी शक्ति से दहाड़ भरी तो सदैव साथ रहने वाला भेड़ों का झुण्ड भयभीत होकर तितर बितर हो गया। शीघ्र ही उस शावक ने भी सिंह के साथ छलांग लगाई और सिंहों के झुण्ड में शामिल हो गया। यह स्पष्ट ही है कि अपने सिंहत्व की शक्ति को पहचानने स्वीकारने मात्र से ही उसकी दीनता समाप्त हो गई और वह अपने स्वभाव भूत सिंह की शक्तियों की अनुभूति एवं आनन्द पूर्वक रहने लगा। उसे अपने में सिंहत्व की शक्ति कहीं बाहर से नहीं लानी पड़ी।

इसी प्रकार खान से निकले हुये कोयले से आवृत्त हीरे में बाहर से काला दिखने पर भी आन्तरिक सौंदर्य एवं चमक पूरी की पूरी विद्यमान होती है। जरूरत केवल बाहृय कालिमा को हटाने की है सर्वांगसुन्दर हीरा अपने दैदीप्यमान रूप में स्वत: ही प्रगट हो जाता है। खान से निकली पत्थर की शिला में प्रतिमा छिपी होती है जिसे पारखी व कुशल कारीगर पहचान लेता है और बाहरी आवरण- अतिरिक्त पत्थर हटा देने पर वह सर्वांगसुन्दर प्रतिमा प्रगट हो जाती है जो प्रतिष्ठित होने पर जगत पूज्य बन जाती है।

भगवान महावीर कहते हैं कि जिस प्रकार सिंह शावक में सिंहत्व, हीरे के पत्थर में हीरा तथा पत्थर की शिला में देव प्रतिमा स्वाभाविक रूप से ही विद्यमान है उसी प्रकार इस आत्मा में भी परमात्मा बनने की सामर्थ्य सहज रूप से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी शक्ति को पहचानें और तदनुरूप आचरण करें।

उक्त उदाहरणों में सिंह शावक को कुछ करना नहीं था। केवल अपनी शक्ति को अपने सिंहत्व को स्वीकार मात्र करना था। अपने स्वरूप की यह अजानकारी ही उसकी दीनता का मूल कारण थी। इसी प्रकार ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य आदि अनन्त सामर्थ्य से परिपूर्ण यह आत्मा यदि अपनी शक्ति को पहचान कर राग-द्वेष मोहादि विकारी वृत्तियों से मुक्त हो जावे तो यह भी परमात्मा बन सकता है। निर्विकार आत्मा ही सर्वोत्कृष्ट आत्मा-परमात्मा कहे जाते हैं।

लेखक – सुशील कुमार जैन (से.नि.प्राचार्य)

4 के 23, तलवण्डी, कोटा

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