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दीनों का करुण – क्रन्दन हम से सुना न जाये

महाकवि माघ उदारचित्त  एवं दानी थे। वे जब जब राजभवन से वापस आते तो याचकों की लम्बी पंक्ति दान की प्रतीक्षा में खड़ी रहती थी। उन्हें संस्कृत कविता सुनाने के उपलक्ष में लाखों रुपया पारितोषक मिलता था किन्तु वह रुपया दीन दुखियों को बाँट दिया करते थे। कभी-कभी तो अपना परिवार भूखा रह जाता किन्तु सब द्रव्य दीनों को बाँट देते थें। एक दिन उनकी पत्नी ने भूख से तड़पते  हुए कहा- “लाखों इनाम पाते दुखियों को जा खिलाते। हम और आप भूखे क्यों व्यर्थ दुख उठाते”।

महाकवि माघ ने उत्तर दिया- “अपनी क्षुधा तपन को सन्तोष जल बुझाये। दीनो का करुण क्रन्दन हम से सुना न जाये”। पत्नी इससे आगे कुछ न बोल सकी।

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