Short Stories

लोकेषणा बाधा है प्रगति में

राष्ट्रपति महात्मा गांधी, सन्त विनोबा  को बहुत सम्मान देते थे, और विनोबा भी अपनी श्रद्धा का केन्द्र गांधी जी को ही मानते थे। एक दिन बापू का पत्र पढ़ते – पढ़ते ही उन्होने फाड़कर फेंक दिया। यह देख वहाँ बैठे आश्रमवासियों को बडा़ आश्चर्य हुआ। एक ने आखिर विनोबा जी से पूछ ही लिया, “सन्त जी! आखिर ऐसा क्या लिखा था?”

“झूठ,बिल्कुल झूठ लिखा था गांधी जी ने।”

“पर, आप तो कहते हो कि गांधी जी कभी झूठ नहीं बोलते। सच-सच बताइये, प़त्र में क्या लिखा था?” उस सज्जन ने पूनः पूछा।

“लिखा था कि मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हूँ। अरे भाई, दुनिया मे मुझसे भी ज्यादा गुणी लोग हैं। फिर मैं कैसे सर्वश्रेष्ठ हो सकता हूँ ?”

“फिर भी आपको पत्र नहीं फाड़ना चाहिए था।”

“मेरे पास वह पत्र रहता तो मुझमें अहंकार पैदा हो सकता था। अहंकार ,प्रगति में बाधक बनता है। इसलिए उसे फाड़ता नहीं तो क्या करता?”

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