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भिक्षुक की अन्तिम इच्छा

कानपुर की बात है। गंगा किनारे घाट पर भिखारियों की बस्ती है। वहाँ एक भिखारी वर्षो से रहता था। बीमार हुआ, सरकारी अस्पताल मे लाया गया। आपरेशन से ठीक हो गया, लेकिन दिन प्रतिदिन कमजोरी बढ़ती गई।

अपनी मृत्यु निकट समझकर डाक्टर से बोला – मेरी पोटली खोलिए डाक्टर ने पोटली खोली। उसने देखा कि उसमें पूरे सात हजार रुपये थे। भिखारी बोला डाक्टर साहब मैंने पैसा-पैसा मांग कर यह इकट्ठे किए है। मेरी यह आखिरी इच्छा है कि इन रुपयों का गरीब विद्यार्थियों की पढ़ाई मे उपयोग हो। क्योंकि मेरे माता-पिता ने बहुत समझाया लेकिन मैं पढ़ा नही, जिससे मुझे जिन्दगी भर भीख मांगनी पड़ी। अगर आप इन रुपयों को पढ़ाई में खर्च करेगे तो मेरी आत्मा को संतोष होगा।

डाक्टर ने पूछा – क्या तुम्हारे क्रिया कर्म के लिए इसमें से कुछ खर्च न किया जाय? भिखारी बोला – डाक्टर साहब, नहीं इसमें से एक पैसा भी नहीं। मैं तो गंगामाई के किनारे ही रहा हूँ। अब मौत आ रही है तो मुझे गंगामाई के गोद में ही बहा दें। माँ की गोद से और कौन सी अच्छी जगह होगी? छः घण्टे के बाद उस भिखारी की मृत्यु हो गई। लेकिन बात भिखारियों में फैल चुकी थी। भिखारियों ने थोड़ा-थोड़ा कर तीन हजार रुपये इकट्ठे किए। इस रकम मे से गरीब विद्यार्थियों को पढ़ाई करवाने का डाक्टरों ने निर्णय किया।

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