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यह है उत्तम क्षमा

पंडित गोपालदास जी बरैया अपने युग के विशिष्ट ख्यातिप्राप्त विद्वान थे। उनके जीवन में क्षमा, शांति, सत्य संयम, निर्लाेभता, त्याग का सहज निवास था। वे धर्म के उपदेष्टा ही नहीं थे, वे धर्म धुरंधर विद्वान थे। उनके जीवन में जिनागम के चारों अनुयोग सजीव पढ़ने को मिल जाते थे। उनके जीवन की घटनाएं उनके स्वच्छ जीवन की साक्षीभूत थीं। किन्तु उनकी पत्नी बहुत ही तीव्र उग्रस्वभाव की थी। एक दिवस शीतकाल में एक धार्मिक उत्सव में दिन भर एवं अर्धरात्रि तक व्यस्त रहे। अर्धरात्रि के पश्चात् घर पर पहुंचे। पत्नी को किवाड़ खोलने को अनेक आवाजें लगाई किन्तु अपने स्वभाव के अनुरूप पत्नी चुपचाप लेटी रही। पड़ोस के लोग जाग गये, किन्तु कहावत है – सोते हुए को जगाया जा सकता है किन्तु जो सोने का बहाना बनाकर सोया हुआ है, उसे कौन जगा सकता है? पड़ोसियों ने भी उच्चस्वर मे आवाजें लगाईं, कुन्डी खड़खड़ाई, तब मुश्किलों से पंडतानी ने किवाड़ खोले, साथ में अपनी उग्रता (भयंकर क्रोधाग्नि) के भी किवाड़ खोल दिये। अभी अभी नींद आई थी कि ये आ धमके। जहां दिन बिताया, ही क्यों नहीं सो गये।

पंडित जी सर्दी में कांपते हुए भी चुपचाप मन ही मन मुस्करा रह थे। बहुत देर तक बड़बड़ाने के बाद भी जब गुस्सा शांत नही हुआ क्योंकि क्रोधी चाहता था कि सामने वाला कुछ बोले तो फिर मैं अच्छी खबर लूँ, सैंकड़ों सुनाऊं। किन्तु पं॰ जी को तो जड़ शब्द भाषा वर्गणाएं थी, जो आत्मा को छू भी नहीं पाती, तब उनसे आत्मा का क्या बिगाड़ हो सकता है? तथा क्रोधी स्वयं क्रोधग्नि में दहक रहा है, वह तो करुणा का पात्र है, घृणा का पात्र नही है। जलते हुए को क्रोध करके और जलाना यह धर्मात्मा का कार्य नहीं है। अज्ञानी मूढ़ जीव ही जलते हुए को क्रोध करके उसे अधिक से अधिक जलाने का भयंकर पाप करता है ,भूला हुआ करुणा का ही पात्र होता है। जब पत्नी का गुस्सा पचा नहीं तो उसने भयंकर गुस्से मे आकर एक ठंडे घड़े का पानी पं॰ जी के ऊपर उड़ेल दिया। और व्यंग से कहने लगी- पंडित जी महाराज, बहुत ठंडे मिजाज के हो, जरा और ठंडा हो जाओ। पं॰ जी ने हंसते हुए  उत्तर दिया-देवी ,तू है तो समझदार। प्रकति के नियम को नहीं तोड़ा, क्योंकि प्रकृति में ऐसा ही होता है-बादल पहले खूब गरजते हैं, पश्चात् बरसते हैं, वही तो तूने किया-पहले गरजती रही, पश्चात् फिर वर्षा कर दी।

उसी समय एक सज्जन बोल उठे – पं॰ जी, दुनिया को सुधारने को लिए व्याख्यान झाड़ते हो, पहले अपनी पत्नी को तो सुधार लो। पं॰ जी बोले-भैया, शिष्य को सुधारने का उपाय किया जा सकता है क्या  गुरु को सुधारा जाता है? यह तो हमारी गुरु है, हमारी परीक्षा लेती रहती है कि तुम दुनिया को समताभाव और क्षमा  का उपदेश देते रहते हो, किन्तु तुम में समताभाव आया कि नहीं? क्या तुम चाहते हो कि मैं परीक्षा में फेल हो जाऊं? मैं तो परीक्षा मे पास होने का प्रयत्न करता रहता हूँ।

वे सज्जन बोल उठे-धन्य है महाराज, तुम्हारे अटूट समताभाव का।यह है ज्ञानी की उत्तम क्षमा।

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