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मुझे इनकी माँ को निपूती नहीं बनाना है!

द्रौपदी के पाँचो पुत्रों की लाशें पड़ी थीं उसके आगे। माँ के सभी पुत्र मर जायें- इससे बढ़कर उसके लिए और कौन दुख हो सकता है? अर्जुन अश्वत्थामा को पकड़ लाये।

भीमसेन गरजे – ‘हमारे बेटों को मारने वाले दुष्ट का सिर तत्काल उड़ा देना चाहिए।’

तभी दुख से व्याकुल द्रौपदी सबके बीच आ खड़ी हुई। बोली – ‘मैं तो निपूती बनी ही, पर गुरु पत्नी को मैं निपूती नहीं बनने दूँगी। बेटे के मरने का दुख माँ ही महसूस कर सकती है। माना, इन्होंने हमारे बेटों को मार डाला, पर इन्हें मारने से इनकी माँ को कितना दुख होगा, यह मैं समझ सकती हूँ। इसलिए इन्हें छोड़ दो।’

पुत्रों की हत्या करने वाले को भी जो क्षमा कर दे, उसकी सहन शीलता का भी कोई पार है? धन्य है द्रौपदी की यह शानदार क्षमा!

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