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ज्ञान और व्यवहार

एक तपस्वी शिष्य था। किसी बात को लेकर उसमें अपने गुरु के प्रति अश्रद्धा हो गयी। फिर भी गुरु ने कहा- “शास्त्रार्थ में तो परस्पर एक – दूसरे को संतुष्ट करना पड़ता है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता। गुरु के प्रति अश्रद्धा पाप है, अहंकार है। मैंने तुम्हें तीक्ष्ण अकाट्य तर्क बताए और तू नाराज हो गया।” किन्तु शिष्य अभिमान से भर गया था। वह रूठकर चला गया। पर गुरु ने तो फिर भी सच्चे हृदय से उसे आशीर्वाद दिया। शिष्य चारों ओर भटकता रहा। उसे कहीं भी शांति नहीं मिली। इस तरह वर्षों बीत गये। अंत में वह बिल्कुल अशांत होकर वापस गुरु के पास लौट आया। गुरु ने उसे बहुत ही अपनेपन से आश्रय दिया। स्नेह प्रदान किया पूछा – “बोलो वत्स !”
“प्रभु! मुझे कहीं भी शांति नहीं मिली क्योंकि में सर्वोपरि नही बना। मुझमें क्रोध और अहंकार की मात्रा बढ़ती जा रही है। हर पल मन अशांति से घिरा रहता है। मैंने सोचा कि मैंने सारे शास्त्र पढ़कर व लम्बी तपस्या करके सब कुछ प्राप्त कर लिया है। अपने को बहुत योग्य समझने लगा था मैं।”
गुरुजी ने स्नेह से कहा- “वत्स। तुमने गहन अघ्ययन एवं तपस्या के बाद भी अपने से बड़े एवं गुरु के प्रति असीम श्रद्धा करनी नहीं सीखी। वत्स! ज्ञान की सम्पूर्णता तभी आती है जब उसमें अहंकार न हो। तुम्हारे भीतर ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ अहंकार की मात्रा भी बढ़ती गयी। यह अहंकार ही है जो तुममें अशांति पैदा कर रहा है। पहले अहंकार का त्याग करो। अहंकार की समाप्ति के बाद ही तुम्हें हर वस्तु व आलोक का सही दर्शन होगा। ज्ञान का व्यावहारिक रूप गुरु के पास रह कर ही सीख जा सकता है। सुनो, अपने को अकिंचन समझो, बलवान होते हुए भी दुर्बल जानो, समर्थ होते हुए भी असमर्थ कहो, विराट होते हुए भी अपने को लघु कहो, सम्पूर्ण होते हुए भी अपूर्ण कहो। यह लघुता का भान ही मनुष्य को असीम शांति देता है, उसे विराट बनाता है, उसे पूर्ण करता है। शिष्य गुरु के चरणों में लौट गया।

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