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पहले शाह – फिर बादशाह

उत्तर भारत में शाह शब्द कम ही देखने व सुनने को मिलता है, किन्तु गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में जैनों के नाम के पूर्व शाह शब्द बहुलता से देखा जाता है। लोगों की यही धारणा है कि बादशाह के ही शाह लगता है। अतः निम्न कथानक के आधार से शाह जैनों के लगना युक्ति संगत है। सं॰ 1536 की घटना है उस समय गुजरात का सुल्तान महमूद बेगड़ा था। चांपा नगर के गौरव चांपसी मेहता वहां के नगर सेठ थे, तथा सार्दुलंखा उमराव था। एक बार वे दोनों राज दरबार में बातचीत करते हुए जा रहे थे। मार्ग में वहां का प्रसिद्ध चारण मिल गया। उसने नगर सेठ चांपसी मेहता की दिल खोलकर बहुत प्रशंसा की और आखिरी में कहा – पहले शाह है बादशाह बाद में है। चारण द्वारा नगर सेठ की दिल खोलकर इतनी प्रशंसा उमराव को असह्य लगी किन्तु उसके सामने उसने कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। राजदरबार में पहुँचा, सभा के पूर्ण होने पर उसने बात को “तिल का ताड़” बना कर बादशाह के सम्मुख प्रस्तुत की। कहते है- “बादशाह का बादशाह कौन”

बादशाह ने अपने अनुचरों द्वारा उसी समय चारण को बुलाकर पूछा – बताओ। तुम जैनो की इतनी प्रशंसा क्यों करते हो। चारण ने कहा – जहांपनाह! जैनों के पूर्वजों ने ऐसे-ऐसे कार्य किये हैं जिन्हे गुजरात तो क्या देश की जनता भूल नही सकती।

बादशाह ने पुनः पूछा – चारण जी! बादशाह शब्द मे शाह शब्द बाद मे लगता है, जबकि जैनियों के शाह शब्द पहले लगता है। क्या यह ठीक है? क्या इस प्रकार लगाना हमारा अपमान नहीं माना जा सकता? चारण ने निर्भीक एवं स्पष्ट उत्तर देते हुए कहा कि-बादशाह से भी ज्यादा शाह (जैन) लोगों मे शक्ति सामर्थ है। उनमें दया अनुकम्पा, उदारता है, वह लोग संसार का भला कर सकते हैं। आपने सुना ही होगा सं॰1315 में इस राज्य में भयंकर दुष्काल पड़ा था, उस समय जगडूशाह ने अपनी उदारता का परिचय देते हुए जगह जगह दान शालाएं खोलकर जनता की सहायता की, मरने से बचाया था। आदि-आदि कार्य इन शाहों ने किये हैं। बादशाह चारण की स्पष्ट व वस्तु स्थिति श्रवण कर चुप हो गया।

संयोग की बात है कि दूसरे ही वर्ष उधर भयंकर दुष्काल पड़ गया। बादशाह ने सोचा अब चारण द्वारा शाह की प्रशंसा को देखते हुए उनकी परीक्षा लेने की अच्छा अवसर है। यह विचार कर बादशाह ने चारण को बुलाया और कहा – तुमने शाह की प्रशंसा की थी, अब उस बात को यथार्थ कर दिखाओ अन्यथा तुम्हें मृत्युदण्ड से दण्डित किया जायगा।

सुल्तान महमूद बेगड़ा के उक्त कथन को सुनकर चारण उसी समय उदास मन से चांपसी नगर सेठ के यहाँ पहुंचा, और बोला – सेठ साहब? आप लोगों की परीक्षा का समय हो गया है। परीक्षा में आपको उत्तीर्ण होना है। बादशाह मुझे मृत्यु दण्ड देगा, साथ ही आप लोगों की शाह पदवी भी छीन लेगा, आदि कहते हुए बादशाह से चारण की हुई वार्ता का उल्लेख कर दिया। सेठ ने चारण से सारी स्थिति समझकर कहा – चारण जी तुम घबराओ मत, बादशाह के पास जाओ, और एक माह का समय मांग लो इस अवधि में हम सारी व्यवस्था करने का प्रयास करेंगे।

चांपसी मेहता की उदारवृत्ति, दया अनुकम्पा सुविख्यात थी। उन्होंने नगर के सभी सेठ सामन्तों की एक बैठक बुलाई, और बादशाह की बात से अवगत कराया। उपस्थित सभी सेठों ने आश्वसन दिया, अपने सामर्थ्यानुसार दिनों के खर्चे लिखा दिये। किसी ने एक, किसी ने दो, किसी न 5, किसी ने दस तो किसी ने पन्द्रह दिनो का खर्चा वहन करने का लिखाया। उपस्थित सदस्यों ने चार माह की अर्थात् 120 दिन की बारी ले ली। अब उनक सामने 8 माह की समस्या सामने थी, जिसकी सम्पूर्ति के लिए उन्हें बाहर से व्यवस्था करनी थी। नगर सेठ सहित चांपानेर के प्रतिष्ठित सदस्य पाटण पहुचे, जहां से उनको 2 माह की व्यवस्था की तिथियाँ लिखवा। उसके बाद धोलके के उदारमनाओं न दस दिन की मितियां लिखी। अब उनको 5 महा 20 दिन की व्यवस्था और करनी थी इस व्यवस्था में उनको 20 दिन का समय लग गया था, अवशेष 10 दिन रह गये। समय की अल्पता उनके मानस में चिन्ता का विषय बनी हुई थी, वे धोलके से धंधुका जा रहे थे। रास्ते मे एक छोटा सा गाँव आया, गाँव का नाम था हडाला। साधारण वेशभूषा मे गाँव के बाहर अपने पशुओं को पानी पिला रहे खेमा देदराणी ने जाते हुए श्रीमन्तों को देखकर कहा – आप लोगों से मेरा छोटा सा निवेदन है – वह यह कि मुझे आतिथ्य सत्कार का अवसर प्रदान करें। मैं बिना भोजन किये आप लोगों को जाने नहीं दूंगा। उन्होंने टालने का प्रयत्न किया किन्तु खेमादेदराणी की उत्तम भावना, अति आग्रह को वह टाल नहीं पाये। उसके घर पहुँचे, यथा योग्य आसन देकर, सम्मान पूर्वक उनको भोजन कराया। हडाला की सेठ की सेवा एवं उनकी सेठानी के द्वारा स्वादिष्ट भोजन कर वे उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। भोजनोपरान्त बात को आगे बढ़ाते हुए खेमादेदराणी ने उनके परिचय एवं कार्य के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की।

चांपसी मेहता ने अपना परिचय देते हुए – वस्तु स्थिति बता दी, और खोमादेदारानी से सहयोग का आग्रह किया। विनम्रता की प्रतिमूर्ति, परम पितृभक्त, खेमा देदराणी ने कहा -इसके लिए मैं अपने पिता को पूछ कर बता सकता हूँ। वह अपने पिताजी के पास पहुँचा, सारी बात बताई। पिता ने कहा – खेमा! उन लोगों का आग्रह अति उत्तम है, ऐसे अवसर बार – बार नहीं आते। हमें शाह की लाज रखनी है अपने पास बहुत धन है, शहर वालों को लाभ मिलता रहता है, ऐसे स्वर्णिम अवसर को हाथ से खोना ठीक नहीं हैं, पूरे बारह महिने की व्यवस्था की स्वीकृति दे दो। अपने पिता श्री की भावना एवं आज्ञा पाकर खेमा चांपानेर के श्रीमंतो के पास पहुँचा और कहा कि आप लोग तो हमेशा लाभ लेते रहते हैं पर एक वर्ष का सारा लाभ मुझे देने की कृपा करें। सेठ लोगों ने सोचा – कहीं यह पागल तो नहीं हो गया है। हम इतने बड़े नगर के सेठ भी चार माह से ज्यादा मितियां लिखवाने की स्थिति में नहीं हैं? यह छोटे से गाँव का रहने वाला, साधारण स्थिति का व्यक्ति 12 महिने का खर्चा कैसे वहन कर सकता है? उन्होंने कहा – खेमा जी लखपति, करोड़पति सेठ भी 12 माह का खर्चा नहीं दे सकें आप क्या कह रहे हैं, यह बच्चों का खेल नहीं है। आप सोचिये, अपने धन की जाँच कीजिये, आप 2-4 दिन के खर्चे की मिति ही लिखवा दो।

चांपानेर के सेठों को क्या पता था कि खेमा के पास कितना खजाना भरा है? खेमा ने उनको कहा – कृपया आप मकान के अन्दर पधारिये। उनके अन्दर आने पर उसने धन का भण्डार खोला। बहुमूल्य हीर, पन्ने, माणक, मोती जवाहरात के ढेर लगे हुए थे। सोना, चांदी के गोदाम भरे थे। समागत सेठों की आँखें चौंधिया गई। वे तो समझ रहे थे कि यह साधारण वेशभूषा, साधारण मकान वाला साधारण व्यक्ति ही होगा? किन्तु उसके कुबेर जैसे खजाने को देखकर सारी शंका निर्मूल हो गयी। और उन्होंने खेमा से कहा – तुम बारह महिने तो क्या बारह वर्ष का खर्चा भी वहन कर सकते हो। हमें आपने चिन्ता मुक्त कर शाह सरदारो की लाज रखी इसके लिए आभार व्यक्त करते हैं। साथ चांपानेर चलने का आग्रह किया। पिताश्री की आज्ञा पाकर खेमा सेठों के साथ वहाँ पहुँचा। सुल्तान को शाह की प्रतीक्षा थी। पच्चीस दिन व्यतीत हो गये थे, 5 दिन ही शेष रह गये थे। बादशाह के समक्ष शाह उपस्थित हुए।

बादशाह पूछने लगा – आप लोगों को स्मरण है या नहीं? क्या किया आपने? शाह पद की लज्जा रख सकोगे?

प्रश्न प्रतिप्रश्नां को सुनकर, नगर सेठ चांपसी मेहता ने कहा – हुजूर। हमारी इज्जत हमेशा बनी रहती है। हमारे प्रान्त में ऐसे उदारमन, दानवीर, भाग्यशाली शाह बैठे हैं जो एक साल का सारा खर्चा एक ही व्यक्ति देने का तत्पर है। आप हुक्म कीजिए कहाँ क्या करना है? सुल्तान महमूद बेगड़ा इस प्रकार का जवाब प्रत्युत्तर में सुनकर आश्चर्य चकित हो गया। खेमा देदराणी से उसने पूछा – बताओ? तुम्हारे पास कितने गाँवो की जागीर है। खेमा ने सहज भाव से उत्तर देते हुए कहा – हुजूर! एक पली और एक पायली। अर्थात पली से तेल बेचा जाता है। यही मेरी जागीर है। देवगुरु धर्म के प्रताप से मैं सुखी हूँ। प्रत्युत्तर सुनकर बादशाह ने कहा – वस्तुतः चारण द्वारा की गई शाह की प्रशंसा सत्य है। “जैनियों के शाह पहले बादशाह के शाह बाद में” का समाधान हो गया। खेमा देदराणी ने विक्रम सं॰ 1539 में एक वर्ष पर्यन्त अन्नादि प्रदान कर गुजरात को दुष्काल के संकट से बचाकर अपना नाम इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों में अंकित करवा लिया। उक्त उदाहरण चिन्तन मनन कर हमे भी उदारता के साथ ऐसे प्रसंगों पर सहयोग कर देश के प्रति सच्ची भक्ति का परिचय देना चाहिए।

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