Short Stories

कसाई का पश्चाताप

मंगलू कसाई ने शाम को छह बकरे और चार बकरियां मैटाडोर से उतरवा कर अपने मकान में पिछवाड़े बरामदे में बांध दिए वह प्रसन्न हो रहा था,   उससे कई गुणा अधिक दुःखी थे वे निरीह पशु जिन्हें अपनी मौत का पूर्वाभास हो चुका था। मंगलू ने जो घास पत्ते  खाने को दिए, उन जीवों ने उसे देखा तक भी नहीं। रात को सोने से पूर्व मंगलू ने एक बार फिर सभी बकरे – बकरियों पर नजर डाली और लौटने लगा था कि उसकी निगाह एक बकरे की आँखो पर जा पड़ी, जिसमें से आँसू अविरल बहे जा रहे थे। “रो ले बेटा, रो ले! सुबह सबसे पहले तेरा ही संकट दूर करूँगा।” स्वप्न में मंगलू ने देखा कि एक बकरा फफक-फफक कर रो रहा है। वह बकरे के पास जाकर रोने का कारण पूछता है तो बकरा आदमी के स्वर में बोल उठता है , “मंगलू, मैं अपनी हत्या के भय से नहीं रो रहा हूँ मैं तो धन्यभागी हूँ कि तुम्हारे हाथों से मेरा कत्ल होगा। मंगलू हैरान होकर पूछने लगता है, “मेरे होथों से!….क्यों? मेरे हाथों मे ऐसा क्या है?” आज से पाँच साल पहले तुम्हारा बेटा रमलू बाढ़ के पानी में बह गया था वह और कोई नहीं था बापू …..मैं था मैं। बकरा कहे जा रहा था “अब अपने बाप के हाथों से मरूँगा तो शायद स्वर्ग मिल जाए।” “नहीं….नहीं …!” मंगलू चिल्ला उठा। झटके से उसकी नींद टूट गई। पसीने से तर-बतर उसका शरीर, भय से सहमी हुई उसकी आँखें …। वह भागा पिछवाड़े की ओर, सभी बकरे बैठ कर शायद अपने भविष्य के बारे में सोच रहे थे लेकिन रोने वाला बकरा अभी तक खड़ा था। यह देख मंगलू ने सबको छोड़ दिया।

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