Short Stories

करुणा रस से बहता श्रोत

राजा भोज की सभा में विशिष्ट कला विभूषित युगचेता नवरत्न नाम से नव विशिष्ट विद्वान् अपनी-अपनी कलाओं में निष्णात लोक और परलोक के मर्मज्ञ उपस्थित रहते थे। उनमें संस्कृत के महान् कवि’ माघ’ उच्च कोटि के विद्वान् थे। उनके संस्कृत के अनेक काव्य बहुत समादृत रहे हैं। इस विद्वत्ता के अतिरिक्त वे औघड़ दानी थे। संस्कृत की मर्मस्पर्शी कविताओं पर लाखों मुद्राएं उन्हें पुरस्कार में मिल जाती थी, किन्तु वे उन मुद्राओं का अपने लिए उपयोग नही करते थे। बल्कि घर पहुँचते-2 दीन हीन भूखे प्यासे लोगों मे वितरित कर देते थे। कभी-2 ऐसा भी होता था  कि घर पहुँचने पर कुछ भी राशि शेष नहीं बचती थी। एक बार ऐसा ही हुआ कि दो दिन से सब धन वितरित करते हुए खाली हाथ घर में पहुँच गयें। पत्नी और बच्चे आशा लगाये बैठे थे कि कविवर आयेंगे और हम विशिष्ट भोजन पा जायेंगे, किन्तु विशिष्ट की बात तो जाने दो, वहाँ तो सामान्य भोजन का भी इंतजाम नहीं हो पा रहा था। क्योंकि दो दिन से कविराज पुरस्कार पाकर भी खाली के खाली घर आ जाते थे।

घर में आटे दाल का प्रबन्ध नहीं हो सका। बच्चे भूख से तड़फ रहे थे। उनकी आशाओं पर जब निराशा के बादल छा गये, तो वे दुखी होकर रोने लगे।उन्हें रोता देखकर उनकी मां भी दुखी होकर तड़फ उठी। और कविवर माघ से कहने लगी – दो दिन से घर में आटा  नहीं है और आप हैं कि सारी पुरस्कार राशि बांटकर खाली हाथ घर आ  जाते है। आज तो बच्चों को पड़ौस से लाकर कुछ खिला पिला दिया है किन्तु अब कल तो अवश्य ही कुछ बचाकर लाना। माघा कवि ने हां भर दी। अगले दिन भी पुरस्कार में बहुत मुद्राएं मिली थी। कविवर ने उनमें  कुछ  मुद्राएं ले जाने के लिए अलग से अपने पास रख ली। घर के पास आते ही कुछ भिखारियों ने गिड़गिड़ाकर याचना प्रस्तुत कर दी। कवि ने घर के लिए बचाई हुइ मुद्राएं निकालकर उन गरीबों को बांट कर दे दी। जब घर पहुँचे तो पत्नी ने प्रश्न किया – कविराज! आज तो बच्चों के पेट में अन्न डालने के लिए क्या बचाकर लाये हो?  यह सुनकर कविवर चुप बैठे रहे, कुछ भी उत्तर नहीं दिया। पत्नी उनका चुप्पी का मतलब समझ चुकी थी। तब वह तड़फड़ाकर बोल उठी –

“लाखों इनाम पाकर दुखियों को जा खिलाते।

हम और आप भूखे क्यों व्यर्थ दुख उठाते?”

कवि का उत्तर इस प्रकार है –

“अपनी क्षुधा तपन को संतोष जल बुझाये।

दीनों का  करुण क्रन्दन हमसे सुना न जाये”।

ऐसे औघड़ दानी इसी भारतभूमि में हो गये हैं, जिनका आदर्श, भौतिक वैभव में आज के समाज में लुप्त प्रायः हो गया है।

जो भरा नहीं सद्भावों से, बहती करुणा रस धार नहीं;

वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें जीवों से प्यार नहीं।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *