Short Stories

इसे कहते हैं ईमान

पाठशाला में फर्नीचर बनाने का काम चल रहा था। कुछ लकड़ी के टुकड़े यहाँ वहाँ पड़े थे, उनको उठाकर पं॰ गोपालदास जी बरैया की पत्नी ने एक चौकी बनवाली।  पं॰जी ने पूछा- यह नई कहाँ से आई? पत्नी ने कहा-लकड़ी के फालतू टुकड़े पड़े थे, उनकी बनवा ली है। पं॰जी ने कहा-वह लकड़ी तो पाठशाला की थी।  इतना कहकर उन्होंने उस मजदूर की मजदूरी और लकड़ी के दाम पाठशाला में जमा कर दिये।

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