Short Stories

ज्ञानी का दान

जयपुर राज्य के दीवान अमरचन्द जी हजारों रुपया गुप्तदान में दिया करते थे। उन्हें पता चलता कि कहीं कोई दीन दरिद्री व्यक्ति है तो अपने आप गाड़ियों में अनाज भरकर बोरियों मे मुहरे  दबाकर भेज देते थे। एक बार राजा ने इनक दान की प्रशंसा करते हुए कहा- ’’निर्मोही दीवान तुम्हारा धन्य धन्य यह जीवन। परहित में नित करते रहते तन धन जीवन अर्पण। यह सुनकर दीवन जी ने उत्तर दिया -’’तन धन वसन कभी न अपना यह जड़-द्रव्य पराया। अपना क्या देते हैं इसमें कौन इन्हें दे पाया ” ? उत्तर सुनकर राजा खुशी से झूम उठे।

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