दुःख एक बार अतिथि बनकर मनुष्य के घर आया। मनुष्य उसका स्वागत तो नहीं कर सका, पर घर आए अतिथि को उससे दुत्कारा भी नहीं गया। ज्यों-त्यों उसने उसे निबाहा। कालान्तर में वह चला गया; तब मनुष्य को अनुभव हुआ कि उसके साहचर्य से उसे जीवन के अनेक रहस्य प्राप्त हुए हैं। जीवन संग्राम में जूझने का उसका सामर्थ्य भी पहले की अपेक्षा कुछ बढ़ गया है। एक बार सुख भी अतिथि बनकर मनुष्य के घर आया। मनुष्य ने उसका आगे बढ़कर सत्कार किया और उसके साथ अभिन्नता स्थापित करते हुए अपने व्यक्तित्व की बागडोर भी उसी के हाथों में थमा दी। जो कुछ उसने कहा, वैसा ही करने को वह सदा उद्यत रहा। कालान्तर में जब वह चला गया, तब मनुष्य को अनुभव हुआ कि उसके साहचर्य ने उसे प्रमाद की ओर ढकेल दिया है। दुविधा के क्षणों मे भिड़ जाने की उसकी शक्ति पहले से कुछ घट गयी है और वह जीवन के रणक्षेत्र में पिछड़ गया है ।

Share:

3 comments

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *