वर्णी जी अध्यापकों के साथ सागर में घुमने जा रहे थे कि शहर में बाहर किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दी। वहाँ जाकर देखा तो एक स्त्री के पैर में काँटा लग गया था, जिसके कारण वह दुखी हो रही थी। जब उससे काँटा निकालने को कहा तो उसने इन्कार करते हुए कहा- मैं एक छोटी जाति की स्त्री, पंडितों से अपने पैर स्पर्श नहीं कराना चाहती। किन्तु समझा कर उसका पैर देखा तो खजूर का बहुत बड़ा काँटा था, जिसे हाथ से निकाल सकना कठिन था, अतः एक संडासी मंगाकर उससे काँटा खींच लिया और उसका लकड़ी का बोझ वर्णी जी ने अपने सिर पर रखकर उसके घर तक पहुँचा दिया।

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