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गरिष्ठाहार से अधोगति

एक हजार वर्ष तक घोर तप कर कंडरिक मुनि ने शरीर सुखा दिया था। जिसे देख देवों ने भी मस्तक झुका दिया था। एक बार इनके सांसारिक भाई पुंडरिक ने लघु भ्राता के अतिदुर्बल शरीर को गुरु आज्ञा ले अपने घर ले जाने की इच्छा प्रकट की। गुरु ने सकारण दोषित आहार लेने हेतु अनुमति दी और गुरु विहार कर अन्यत्र चले गये। पुंडरिक ने जिनालय में कुंडरिक मुनि को रख उत्तम रस वाले आहार से सेवा की। कुछ दिनों में पुष्ट हो मुनि स्वस्थ हो गयें। पौष्टिक आहार से मुनि प्रमाद में फंस गये और सिर्फ दो दिन का राज्य ले पतन के गर्त में सातवी नरक के गामी बने। यह पौष्टिक व गरिष्ठाहार से ही अधोपतन हुआ। अतः ब्रह्मचारी सावधान रहें।

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