Short Stories

समान स्वभाव में मित्रता

महाराष्ट्र के महान् सन्त गुरु रामदास के अपने आश्रम में एक दिन कुछ बच्चे आ गए। बच्चे उनके साथ खेल रहे थे और वे बच्चों के साथ; सब चहक रहे थे। इतने में एक विद्वान आ पहुँचे। विद्वानों के दिमाग में शास्त्र भरे रहते हैं। उनके हृदय में शास्त्र नहीं रहते। वे शास्त्रों का बोझ सिर्फ दिमाग पर ढोते रहते हैं। वह आया था सन्त रामदास से शास्त्रों पर बात करने, पर देखता है कि इतना बड़ा विद्वान् सन्त बच्चों के साथ खेल रहा है। वह आश्चर्यान्वित मुद्रा में देखता रहा।
सन्त ने कहा- “पण्डित जी, क्या देख रहे हैं, खेल रहा हूँ।”
आगत विद्वान ने कहा- “जी, ठीक है पर, बच्चों के साथ ?”
“बच्चों के साथ नहीं तो क्या बूढ़ों के साथ खेला जाता है? खेल का आनन्द तो बच्चों के साथ ही आता है। निश्छल-निर्मल जैसा मैं, वैसे ही ये। मैं साधना के द्वारा निश्छल-निर्मल बना हूँ और ये सहज प्रकृति से निश्छल हैं। यदि इनके साथ न खेलूं तो बताइए किसके साथ खेलूं ?” सन्त रामदास ने हँसते हुए, विद्वान को खेल का मर्म समझाया।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *