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निर्भीक व्यक्तित्व

एक बार बादशाह अकबर ने दरबारी शायरों को अपनी सालगिरह के अवसर के लिए एक छंद की अंतिम कड़ी “मिलि आस करे जु अकबर की” की पूर्ति हेतु दी। साथ ही उसे आगरा के गैर राजदरबारी हिन्दी के नामी कवि बनारसीदास को भी दरबारी दूत के जरिये भेजी दी गई। कवि बनारसी दास ने तुरन्त उस छंद कड़ी की पूर्ति कर दरबारी दूत के हाथ में बंद लिफाफा देकर उसे ससम्मान विदा किया। साल गिरह के दिन दरबार हाल में भव्य समारोह में बड़े-बड़े लोग बादशाह को मुबारकबाद देने उपस्थित हुए। कुछ ही देर में दरबारी शायरों ने अपनी-अपनी छंद कविता सुनाना शुरु किया। अन्त में कवि बनारसी दास को अनुपस्थित देखकर बादशाह के निर्देशानुसार स्वयं शायरों के मुखिया ने उनकी छन्द कविता को सुनाया जिस में लिखा थाः-

जिय केतेक भेष धरे जग में, छवि भा गई आज दिगम्बर की।

चिन्तामणि जब प्रगटयो घट में, तब कौन जरूरत अडंबर की।

जिन तारण तरण हि सेय लिए, परवाह करे को जब्बर की।

जिन्हें आस नहीं परमेश्वर की, मिलि आज करेजु अकबर की।

इस पर शायर ने कहा – जहाँपनाह यह भी कोई छन्द कविता है। बिल्कुल बैमोके की बात हैं।

बादशाह अकबर सिंहासन से उठकर बोले – दरबारी शायर बादशाह के बन्दे हैं जबकि कवि बनारसीदास खुदा का बन्दा है, शाबाश।

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