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अहंकार से सर्वनाश

महात्मा अंगिरा के आश्रम मे अनेकों छात्र पढ़ते थे। उनमें उदयन नाम का एक छात्र बहुत प्रतिभाशाली था। उसने गुरु से श्रेष्ठतम ज्ञान प्राप्त किया, पर उसे अपने ज्ञान के प्रदर्शन की उमंग अधिक ही रहती थी। इसके अतिरिक्त वह अपने सहपाठियों से पृथक् प्रभाव दिखाने की कोशिश मे रहता था। गुरुदेव ने सोचा, अपनी प्रतिभा का स्वतंत्र प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति उदयन का विनाश कर दे, इससे पूर्व ही इसे चेताना पड़ेगा। जाड़े के दिन थे। सर्दी से बचाव के लिए छात्रों ने एक तरफ अलाव जला रखा था। सब लकड़ियाँ जलने के बाद उनके अंगारे अलाव में दहक रहे थे। गुरुदेव संध्या आरती करने के बाद कहने लगे, “अलाव बहुत भभक रहा है इसका श्रेय इसमे दहक रहे अंगारों को है न?” सारे शिष्य एक साथ बोल पड़े “जी हाँ, गुरुदेव!”
“देखो उदयन, वह जो अंगारा सबसे बड़ा और सबसे अधिक दहक रहा है, उसे चिमटे से पकड़कर मेरे पास रख दो। इसकी अत्यधिक तपन का लाभ मुझे ही अधिक मिलेगा निकट रखने पर” गुरुदेव ने कहा। उदयन ने चिमटे से पकड़कर वह खूब बड़ा अंगारा गुरुदेव के पास रख दिया, किन्तु यह क्या? अंगारा बुझ-सा गया। उस पर राख की पर्त छा गई और वह दहकता हुआ अंगारा काला कोयला भर रह गया। गुरुदेव ने कोयले की तरफ इशारा करते हए कहा “वत्स!, देखो-तुम सब चाहे जितने ज्ञानवान हो, किन्तु इस कोयले जैसी स्थिति में कभी नहीं आना चाहिये तुम्हें। यह अलाव मे अन्य अगारों के साथ रहता तो यह अंत तक सुलगता रहता और सबसे बाद तक गर्मी देता, पर अब न इसका तेज रहा, न इसकी तपन का लाभ हम उठा सके। इतना कहकर गुरुदेव अपनी कुटिया की तरह चल पड़े। शिष्य उदयन गुरुदेव का आशय भांप गया। उसकी समझ मे आ गया कि गुरु परम्परा वह अलाव है जिसमें प्रतिभाएं संयुक्त रूप से सार्थक होती हैं। स्वयं के ज्ञान का अहंकार करने से मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है, उसकी सारी प्रतिभा व्यर्थ जाती है।

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