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बहिर्मुख दृष्टि से अपना परमात्मा नहीं मिलता

फ्रांसिस अपने बड़े भारी अमीर पिता के पुत्र थे, वे बहुत सुन्दर रेशमी वस्त्र पहिनते थे। एक बार एक भिखारी उनकी दुकान पर आया जो एक फटा सा कपड़ा पहने हुए था। उसे देख कर फ्रांसिस को दया आ गई। उन्होंने उसको पहिनने  के लिए कुछ रेशमी कपड़े देते हूए कहा- लो भाई! ये अच्छे कपड़े पहिन लो।

भिखारी ने उत्तर दिया-’महोदय! क्षमा करें, यदि इन रेशमी कपड़ों को पहिन लूंगा तो फिर मुझे मेरे भीतर बैठा परमात्मा नहीं दिखेगा। क्योंकि इनकी चमक -दमक मे ही दृष्टि उलझ जायगी, तब इन कपड़ों और शरीर की सम्हाल में ही आयु समाप्त हो जायेगी और अपने परमात्मा का दर्शन कभी नहीं हो सकेगा।’

यह सुनकर फ्रांसिस ने कहा – मुझे भी ऐसा ही अनुभव हो रहा है। यह कहकर उन्होंने अपने रेशमी कपड़े फाड़ डाले और अपनी करोड़ो की दुकान छोड़ कर फ्रांसिस उस दरिद्री के साथ हो गये।

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