Short Stories

दिवा स्वप्न में भूला प्राणी

एक रात्रि को महाराज जनक ने स्वप्न में देखा कि किसी राजा ने उनके ऊपर आक्रमण कर दिया है और उनका राज्य छीन कर उन्हें देश से निष्कासित हो जाने का आदेश देकर कहा- “चौबीस घंटे के अन्दर राज्य की सीमा छोड़ दो, अन्यथा तुम्हारा मस्तक धड़ से अलग कर दिया जायेगा।”जनक ऊबड़ -खाबड़ जंगली रास्तों से गिरते-पड़ते तीन दिन बाद एक गाँव में पहुँचे। वे भूख प्यास के मारे बहुत व्याकुल हो रहे थे। उस गाँव में एक सेठ की ओर से सदावृत में खिचड़ी बंट रही थी इन्होंने वहाँ जाकर अपने लिए खिचड़ी की याचना की किन्तु तब तक खिचड़ी बिल्कुल समाप्त हो चुकी थी। अतः वितरक ने असमर्थता प्रगट कर दी। किन्तु जनक ने कहा – भाई! भूख से मेरा तो दम घुट रहा है, जितनी जो कुछ भी हो, मुझे दे दीजिए। तभी वितरक ने एक चम्मच उठा कर बर्तन के अगल-बगल मे अधजली खिचड़ी खुरच कर जनक के हाथ मे रख दी। इतने मे एक चील झपट्टा मार कर उनके हाथ से वह खिचड़ी भी लेकर आकाश मे उड़ गई। यह देख कर जनक चीख उठे और इसी बीच उनकी नींद खुल गई।
जाग जाने पर वे सोचने लगे – मुझे ऐसा स्वप्न क्यों आया? मैं तो राजा हूँ। इस स्वप्न को देखने के बाद उनका मन किसी काम मे लग नहीं रहा था। उनके मस्तिष्क मे वह स्वप्न ही निरन्तर घूम रहा था। वे नित्य कार्य से निवृत होकर राजसभा मे पहुँचे और सिंहासन पर बैठते ही उन्होंने मंत्री और सभासदों से प्रश्न किया। कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर बताओ कि “यह सत्य कि वह सत्य।” यद्यपि जनक की सभा श्रेष्ठ ज्ञानियों की सभा थी किन्तु बे सिर पैर के इस प्रश्न का उत्तर किसी की समझ मे नहीं आया। एक बुद्धिमान् सुमति मंत्री ने उनके भाव को समझते हुए कहा -’महाराज, न ये सत्य और न वह सत्य। जोशाश्वत रहता है , सत्य तो वही है।’ महाराज जनक से घटना सुनकर मंत्री ने कहा- ‘महाराज, वह रात्रि का स्वप्न था और यह जो आप राजपाट देख रहे हैं यह दिन का स्वप्न है। अतः नाशवान होने से जीव की मान्यता के अनुसार हमेशा स्थिर न रह सकने से दोनों असत्य ही हैं। इन सबको जानने वाली ज्ञान परिणति भी शाश्वत नहीं होने से सिर्फ एक समय सत् होकर भी नाशवान् है। एकमात्र ज्ञान दर्शन गुणवाला आत्मद्रव्य ही शाश्वत और सत्य है। यही अनेकान्तिक वस्तु का स्वरूप है।’

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