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निरीह दानी

युग बीते, शताब्दियां बीत गई, किन्तु जगडुशाह का दान आज भी अपनी असामान्य विशेषताओं के कारण इतिहास का प्रेरक सत्य बना हुआ है। एक बार पांच वर्ष का भयंकर दुष्काल पड़ा। लाखों पशु भूखे मर गये। मानव करुणा से प्रेरित होकर जगडुशाह नाम के एक जैन श्रावक ने गांव-गांव में एक सौ बारह दान-शालाएँ खोली। बिना किसी भेद-भाव के भूखों को अन्न दिया जाने लगा। जगडुशाह स्वयं दानशाला में बैठकर अपने हाथों से दान दिया करते थे।

जगडुशाह ने देखा कि उच्च घरानों के कुलीन, श्रेष्ठ व्यक्ति, जिन्हें प्रकृति के प्रकोप एवं परिस्थितियों कें परिवर्तन ने दर-दर भटकने के लिए मजबूर कर दिया है, सामने आकर मांगने में, लेने में शरमाते हैं, तो जगडुशाह ने अपने दान – मंडप में एक पर्दा डलवा दिया। पर्दे के बाहर जगडुशाह बैठता। दान लेने वाला आकर बाहर से भीतर की ओर हाथ फैलाता। जगडुशाह हाथ देखकर, उसकी स्थिति का आकलन करते और पर्दे की खिड़की में चुपचाप उसके हाथ में यथायोग्य काफी कुछ दे देते। किसको दे रहा हूँ? कौन ले रहा है? न कुछ देखता न कुछ पूछता। बिना किसी शोर और हल्ले के, मौन साधे, दान की मन्दाकिनी बह रही थी।

लाख छुपाने पर भी फूलों की महक तो हवा में उड़ती ही है, दूर दूर तक जगडुशाह के दान की कीर्ति फैल गई।

तत्कालीन राजा बीसलदेव ने भी दुष्काल में अपनी प्रजा की सहायता के लिए कुछ दान-सत्र खोले थे, लेकिन अन्न के अभाव में वे शीघ्र बन्द हो गए। उन्होंने जगडुशाह के उदार व निस्पृह दान की बात सुनी और साथ ही यह भी सुना कि बिना मुंह देखे और बिना हाल पूछे, लोगों को अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार दान मिल जाता है, तो राजा बीसलदेव एक भिखारी के वेष में जगडुशाह की परीक्षा करने के लिए उसकी दानशाला में पहुंच गये। पर्दे की खिड़की में से भीतर हाथ डाला तो उनको यथेच्छदान मिल गया। इस दान पद्धति से राजा बाग-बाग हो उठे। धन्य है ऐसे दानवीर!

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