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यह है आदर्श दान!

जयपुर के दीवान अमरचन्द जी आदर्श दानी थे। किसी दीन दुःखी का पता चलने पर उसके किसी रिश्तेदार के नाम से बोरों मे अनाज भरकर और उन बोंरो में कुछ मोहरें दबाकर भेज दिया करते थे। दशलक्षण पर्व पर जयपुर के किसी भी गरीब जैन को नगर से बाहर जाने की या व्यापार करने की रोक रहती थी किन्तु जिनके पास १॰ दिन के खाने का भी प्रबन्घ नहीं होता उन्हें यथेष्ट सहायता भी दी जाती थी।  एक दिन महाराज रामसिंह ने दरबार में आपके दान की बड़ी प्रशंसा की तो दीवान साहब अपनी प्रशंसा सुनकर रोने जैसी सूरत बनाकर बैठ गये। तब राजा ने कहा – कहाँ सीखी दीवानजी ऐसी देनी दैन। ज्यों ज्यों कर ऊँचे उठे त्यों त्यों नीचे नैन।यह सुनकर झट दीवानजी ने उत्तर दिया-भेजनहारा भाग्य है भेजत है दिन रैन। लोग भरम मेरो करें  यातें नींचे नैन।।

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