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दान अथवा व्यापार?

बात पुरानी नहीं। पिछले दिनों एक सेठ जी ने पानी की तरह पैसा बहाकर, बड़े उत्साह से एक मन्दिर बनवाया और मन्दिर संचालन हेतु सात नगर – सेठों की एक प्रबन्ध समिति स्थापित की, जिसमें सेठ जी भी थे। नगर भर में सेठ जी के त्याग पर वाह वाह!! होने लगी। सब सेठ जी की स्तुति करने लगे। उनकी मर्यादा में चार चाँद लग गए, वह चाहते भी यही थे।
परन्तु प्रबन्ध समिति के अगले चुनाव मे सेठ जी को ’दूध की मक्खी’ की तरह निकाल फेंका गया। बेचारे सेठ जी की आकाँक्षाओं पर पानी फिर गया। कुछ दिनों पश्चात् नगर मे एक महात्मा जी आये। सेठ जी ने अपना दुखड़ा सुनाया – ’महात्मन्! संसार कितना कृतघ्न है। मैंने लाखो रुपये व्यय कर मन्दिर बनवाया था परन्तु अब मुझे ही सदस्यों ने मन्दिर-समिति की सदस्यता से पदच्युत कर दिया। बताइए यह कहाँ का न्याय है? जिसने लाखों रुपये व्यय किया उसका कुछ अधिकार नहीं, और जिसका मन्दिर निर्माण में कुछ नहीं लगा, वह मालिक बन बैठे है। पहले तो कोई आगे भी नहीं होता था परन्तु अब पचासों अधिकार जताने वाले पैदा हो गये है।’
सुनकर महात्मा हँस पड़े। बोल ’सेठ जी! आपने दान के सही अर्थ को अभी तक नहीं समझा। वास्तव मे किसी वस्तु को देकर बदले में कुछ प्राप्त करने की आशा दान नहीं, अपितु व्यापार है और जब आपने व्यापार किया तो लाभ-हानि की सम्भावना तो रहेगी ही।’

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