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पहले दिशा फिर दशा बदलो

उत्तर प्रदेश के राजनगर में देवशरण बड़ें धर्मात्मा और ज्ञानी पुरुष थे। एक बार उन्हे सन्निपात हो गया। अवस्था मरणासन्न हो गई। अब उन्होने एक ब्रम्ह्चारी जी के सहयोग से समाधिमरण धारण कर लिया। किन्तु सौभग्य से वे अच्छे हो गए। अब उनकी पत्नी उनकी हर प्रकार सेवा तो करती किन्तु उनका स्पर्श नहीं करती थी। एक दिन उन्होने अपनी पत्नी से इसका कारण पूछा- तो पत्नी ने कहा, “आप तो व्रती पुरुष हैं, क्योंकि आपने सन्यास  लेने के समय सबका त्याग कर दिया था।”

तब देवशरण  बोले- “तब तो मुझे घर में भी रहना नहीं चाहिए”।

पत्नी ने कहा, “मार्ग तो यही है”।

यह सुनकर उन्होने गृहत्याग कर क्षुल्लक भेष घारण कर लिया। एक समय में वे संघ के साथ मे निकटवर्ती गांव में ठहरे हुए थे। उनके विराग और विद्वत्ता की जनता में बड़ी चर्चा थी। अतः राजनगर से उनकी पूर्वपत्नी  भी दर्शनाथै पहुँची। उसने क्षुल्लक जी को तो नहीं पहिचान पाया किन्तु क्षुल्लक जी ने अपनी पत्नी को पहिचान कर कहा- “अरी तू कब आ गयी थी?” पत्नी ने कहा- “आप मुझे अभी तक भूले नहीं हैं”। क्षुल्लकजी को सावधानी का कोड़ा लगा । तबसे उन्होंने आजीवन मौनव्रत ले लिया।

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