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धूल पर धूल!

दक्षिण प्रांत के रांकाजी को अपनी स्त्री को साथ दूसरे गांव को जाते समय एक रूपयों की थैली मिल गई। किन्तु वे उसे जल्दी 2 धूल से ढकने लगे, क्योंकि उन्होंने सोचा कि कहीं पत्नी इसे देखकर लुभा न जाये। इतने मे पत्नी भी आ गई और उसने पूछा – ये क्या कर रहे हो?
रांकाजी ने सकपका कर कहा- “कुछ नहीं, कुछ नहीं।”
तब पत्नी ने थैली के रूपयों को देखा और कहा कि धूल पर धूल पर क्या डालते हो? ये रूपये और सोना चाँदी सभी जड़ पदार्थ भी धूलि की जाति के हैं। इनसे हमे क्या प्रयोजन? इनमे फंस कर तो मनुष्य धर्मभ्रष्ट और पापी हो जाता है।

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