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अहो! आत्मा का कल्पवृक्ष मिल गया

श्रीमद् राजचन्द जी को महात्मा गाँधी ने अपना गुरु स्वीकार किया है। ये अनेक धर्मो के विशेषज्ञ एंव शतावधानी बहुश्रुत विद्वान् थे। इनकी हीरा जवाहरात की प्रसिद्ध दुकान थी। एक दिन वे अपनी दुकान पर बैठे थे। इतने में एक सज्जन आये, उनके हाथ में एक ग्रंथ था, उन्होंन उसे राजचन्द जी को दे दिया। राजचन्द जी भाई उसे खोलकर पढ़ने लगे।

आध घंटे बाद बड़े उल्लास में भरकर खुशी से उछलते हुए बोले – धन्य है इस महाग्रंथ को! इसमें तो धर्म के प्राण, आत्मा की सच्ची सुख शान्ति की बात, आत्मा को पराधीनता से छुटाने की चर्चा एंव आत्मा  की स्वतंत्रता की घोषणा की गई है। अहो! यह ग्रंथ तो अमृत रस का सागर, रत्नों का खजाना ,कामधेनु और आत्मा का कल्पवृक्ष है। आज तो तुमने मुझे अमूल्य रत्न दिया है। वह ग्रंथराज समयसार था। इतना कहकर राजचन्द जी भाई पेटी में से मुट्ठी भर-भरकर रुपया उस ग्रंथ लाने वाले को देने लगे। किताब लाने वाला तथा आसपास के अन्य सभी व्यक्ति भौचक्के होकर देखते रह गये। धन्य धन्य है यह धर्मोल्लास!

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