Short Stories

धर्म की आवश्यकता

एक जिज्ञासु ने मुनिराज से पूछा- ’स्वामिन्! दुनिया में इतना छल,कपट, झूठ, चोरी, व्यभिचार और खून खराबी चल रही है फिर भी आप धर्म की बात करते है। हिंसादि पाप जितनी तेजी से बढ़ रहा हैं उसे देखते हुए आज धर्म बिल्कुल बेकार वस्तु प्रमाणित हो रहा है।

’मुनिवर ने कहा – अधर्म भी धर्म का नाम लेकर चलता है। अधर्म करने वाला भी अपने को न्यायी और धर्मात्मा बतलाकर अपना अपना काम बनाता है। जैसे खोटा सिक्का भी सच्चे सिक्के के नाम पर चलता है। और फिर सोचिये धर्म की मान्यता रहते हुए जब लोग इतनी अशान्ति फैलाते हैं, तब अधर्म के नाम पर क्या दशा  होगी ?

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *