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धर्म को न छोड़ दें

सेनापति! एक रथ में बैठाकर सीता को तीर्थ यात्रा करा दो। यात्रा कराने के बाद सिंहाटवी में अकेली छोड़कर तुम वापस आ जाना।’ राम ने आज्ञा दी।

’स्वामिन्! शरच्चन्द्र जैसी उज्ज्वल सीता माता को आज यह किस अपराध का दण्ड दिया जा रहा है?’  कृतान्तवक्र ने दुखी होकर पूछा। ’सेनापति! राम सीता का त्याग नहीं कर रहे हैं किन्तु राजा राम लोकापवाद के कारण राजनीति के अनुसार सीता के त्याग का आदेश सेनापति  को दे रहे हैं। सेनापति! अविलम्ब आज्ञा का पालन किया जाय।’ राम ने सरोष आदेश सुनाया।

 

कृतान्तवक्र ने अनिच्छा पूर्वक मन में अपनी पराधीनता को धिक्कारते हुए कहा – ’जो आज्ञा।’ सीता को तीर्थों की यात्रा कराकर लौटते हुए भयानक सिंहाटवी में रथ को रोककर कृतान्तवक्र ने कहा – ’मातेश्वरी महारानी जी! आपको रथ से यहीं उतरना है।’

’सेनापति जी! इस भयानक जंगल में कौनसा तीर्थ है? जहाँ आप उतरने को कह रहे हैं।’ यह सुनकर सेनापति जोर से रो पड़ता है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु की धारा बहने लगती है। यह नाटकीय परिवर्तन सीता के कुछ समझ में नहीं आता है। तब वह पूछती हैं- ’सेनापति जी! आपका यह रूपक कुछ समझ में नहीं आ रहा है।’

सेनापति ने कहा – ’महारानी जी! लोकापवाद के कारण स्वामी की आज्ञा आपको इसी वन में छोड़ने की हुई है। पराधीनतावश होकर यह पाप मुझे ही करना पड़ा।’

उस भयंकर वन को देखकर गर्भवती सीता भय से काँप उठी किन्तु विवेक से अपने को संभालकर बोली – ’सेनापति! इसमें स्वामी का कोई दोष नहीं है क्योंकि सभी जीव अपनी अपनी करनी का फल भोगते हैं। अपनी किसी करनी का फल मुझे भी भोगना ही पड़ेगा।’

’माता! स्वामी से आपको कुछ कहना तो नहीं है।’ सेनापति ने पूछा।

’सेनापति जी! यह सन्देश कह देना कि वे मेरे त्याग का कुछ पश्चाताप न करें, ऐसा ही होनहार था। किन्तु इतना ध्यान अवश्य रखें कि जैसे लोकापवाद के भय से दूसरों के बहकावे में आकर बिना परीक्षा किए मुझे छोड़ दिया है, वैसे ही किन्हीं मिथ्यादृष्टि के बहकावे में आकर या लोकापवाद के कारण अपने धर्म को नहीं छोड़ दें।’ सेनापति इस उत्तर को सुनकर कुछ सोचता हुआ चल दिया।

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