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ज्ञानी की दृढ़ता

महाराज जनक अपनी विद्यार्थी अवस्था में अपने गुरु के बड़े स्नेहभाजन थे। जब तक वे पाठशाला में नहीं आते, तब तक गुरु पाठ पढ़ाना प्रारम्भ नहीं करते थे। इससे दूसरे विद्यार्थी आपस में कहते कि गुरु महाराज धनी और निर्धन छात्रों में बड़ा पक्षपात करते है। गुरु उनका भाव समझ गये। एक दिन उन्होंने पढ़ाते समय बताया कि मिथिला में आग लग गई है। यह सुनकर सब छा़त्र अपने-अपने घरों को देखने के लिए भाग गये किन्तु जनक वहीं बैठे अघ्ययन करते रहे। जब लौटकर सब छात्र आये तो जनक को वहीं बैठा देखकर कहने लगे – आप अपने भवन देखने नहीं गये। जनक ने कहा – “जलना होगा तो जलकर रहेगा और बचना होगा तो कोई जला नहीं सकता। फिर मैं कहाँ जल रहा हूँ ?’’ सब इनकी दृढ़ता देखकर जनक की महत्ता समझ गये।

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