Short Stories

दृढता का सुफल

दिल्ली के ब्र॰ बाबा लालमनदास में अपने धर्म की श्रद्धा और लगन अपूर्व थी। वे निरन्तर आत्मसाधना एवं स्वाध्याय व भक्ति पूजन में मग्न रहते थे। वे अपनी प्रतिज्ञाओं का दृढता से पालन करते थे। उनमें तत्व रुचि भी अपूर्व थी। बाबा लालमनदास जी की अनायास ही दोनों आँखों की दृष्टि चली गई। अब आँखों से कुछ नहीं दिखता था  एक दिन वे जिनमन्दिर में माला फेर रहे थे, कि अकस्मात् माला टूट गई और उसके दाने बिखर गये। उन्होंने माला के दोनों को टटोल -टटोलकर ढंूढना आरम्भ कर दिया। बहुत प्रयत्न करने पर भी 4-5 दाने नहीं मिले। तब उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक माला के पूरे दाने नहीं मिल जाते, तब तक मौन रहकर आहार पानी का त्याग है, तथा मन्दिर से  कहीें बाहर भी नहीं जाऊँगा  उन्हें मन्दिर में दाना ढूंढते-2 तीन दिन हो गये किन्तु दाने नहीं मिले। चौथे दिन वेदी के बगल में दाना  ढूंढते-2 खडे़ हुए तो वेदी का किनारा जोर से शिर में लगा और शिर में से खून की धारा बह निकली, किन्तु साथ ही आँख का खराब खून निकल जाने से आँख  अच्छी हो गई। तब अपनी आँखों से ही उन दानों को ढूँढकर चौथे दिन आहार पानी लिया। शुद्धभाव हो, दृढता मन में, जीवन में निश्छल व्यवहार। उसके घर में सभी सिद्धियाँ, चरण चूमतीं शत -2 बार।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *