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आत्मा का रोग – राग – द्वेष – मोह

सनतकुमार चक्रवर्ती का शरीर बहुत सुन्दर था, देवों की सभा में उनकी सुन्दरता की चर्चा हुई। दो देव उनकी सुन्दरता देखने आये, सनतकुमार उस समय अखाड़े में कुश्ती लड़ रहे थे। देवों ने उनसे कहा कि आपकी सुन्दरता के बारे में जैसा सुना था, वह उससे भी बढ़-चढ़कर है। चक्रवर्ती ने कहा, “सुन्दरता तो जब राजसिंहासन पर बैठूं तब देखना।” इस कथन में अभिमान था।

जब दोनों देव राजभवन में गए तो चक्रवर्ती सुन्दर आभूषण पहने हुए राजसिंहासन पर बैठे थे। देवों ने देखकर ‘छीःछी’ किया। चक्रवर्ती ने पूछा- “क्या हुआ?’ देवों ने कहा कि आपका सारा शरीर तो कोढ़ से भर गया है। चक्रवर्ती ने शरीर को देखा। एक धक्का लगा, जो कुछ समय पहले इतना सुन्दर थ, वह अचानक कैसा हो गया?

सनतकुमार को शरीर की असारता देखकर वैराग्य हो गया और वे जंगल में जाकर मुनि होकर तपस्या करने लगे, किन्तु 700 वर्ष तक उन्हें कोढ़ रहा। कुछ दिनों बाद उनमें से एक देव वैद्य का रूप धारण करके सनतकुमार मुनि के पास आया और बोला -“महाराज! मैं बहुत बड़ा वैद्य हूँ मैं आपके कोढ़ का इलाज कर सकता हँ।”

साधु ने कहा – “यह तो शरीर का रोग है। मुझे तो राग-द्वेष का रोग है। अगर आत्मा के इस रोग का नाश कर सकते हो तो कर दो।”

“इस रोग का नाश कोई दूसरा नहीं कर सकता, इसका नाश तो आपको ही करना होता है।” वैद्य वेशधारी देव ने हाथ जोड़कर चरण छू लिये और कहा – “भगवान मुझे क्षमा करें। मैं तो आपकी परीक्षा ले रहा था”।

“कुष्ठ आदि तो शरीर के रोग हैं जो कि कर्म के आधीन हैं। आत्मा का रोग राग-द्वेष रूपी रोग है। जिस आत्मा में जितना ज्यादा राग-द्वेष है वह उतना ही रोगी और दुखी है। पहले यह निश्चय करे कि मुझे राग-द्वेष रूपी रोग है, इसलिए मैं दुखी हूँ। फिर यह निश्चय करे कि यह राग-द्वेष  किसी दूसरे की वजह से नहीं हुआ है। मैंने शरीर और कर्म में अपनापन माना है इससे हुआ है। शरीर में अपनापन अपने स्वरूप को जानने से मिटेगाा। फिर चेष्टा करके अपने स्वरूप को आगम से समझें और अपने में अपने को शरीर से अलग देखें। रोगी जिस प्रकार रोग से बचने की चेष्टा करता हे, रोग के आने से पहले ही उसके कारणों से बचता है और रोग होने पर उसको बढ़ने नहीं देता। तत्काल उसके नाश का उपाय करता है वैसे ही आत्मा में रोग-द्वेष रूपी रोग के उत्पन्न होने के कारणों से बचें। रोग-द्वेष  हो गया है तो उसके मिटाने का बलशाली उपाय करें। रात दिन यह धुन रहे कि मेरा यह रोग कैसे मिटे? उसका उपाय एक मात्र है-बाहर से हटकर अपने में, अपने चैतन्य स्वभाव में लगना, जिसकी भरसक चेष्टा करें। परन्तु हमें शरीर के रोग की चिन्ता है, आत्मा के रोग राग-द्वेष की कितनी चिन्ता है? इसकी परवाह किसे है? इस राग द्वेष रूपी रोग को मिटाने के जो विशे़षज्ञ हैं, ज्ञानी, उनको खोजे और उनके बताये मार्ग पर चलें, तो रोग मिटे। आत्मानुभव रूपी दवा लें और संसार-शरीर-भोगों का परहेज करें, तभी यह रोग मिटेगा।

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