Short Stories

जहाँ मैं हूँ, वहाँ मृत्यु नहीं?

कविवर पं. भागचंद जी जीवन के अन्तिम दिनों में मरणासन्न अवस्था में शांत पड़े थे। उससे एक दिन पूर्व उन्होंने रोग शय्या पर पड़े पड़े एक पद बनाया था – “अब हम अमर भये न मरेंगे।” चेहरे पर अपूर्व शांति थी। एक मित्र ने पूछा – पं. जी, इस अवसर पर भी आपको अपूर्व शान्ति है। दुनिया मृत्यु से घबराती है और आप हंस रहे हैं। पं. जी ने कहा – जहाँ मैं हूँ, वहाँ मृत्यु नहीं, दुख नहीं, संकट नहीं। और जहाँ मृत्यु, दुःख और संकट है वहाँ मैं नहीं। उन्होंने धीरे से गुनगुनाया -अब हम अमर भये न मरेंगे।

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