एक महात्मा के पास एक भक्त पहुँचा। उसने निवेदन किया कि प्रभो! मैं परमात्मा से मिलना चाहता हूँ, आप मुझे मार्ग बताइये। संत ने भक्त की जिज्ञासा देखकर उसे भगवान से मिलने की उपासना पद्धति सिखलाई। भक्त उस पद्धति को तन्मयता से अपनाने लगा। एक दिन महात्मा ने कहा-सामने के वृक्ष पर मेरी झोली रखी हुई है, उसमें एक लोहे की डिबिया है। उसमें पारस पत्थर है, उसे ले आओ

भक्त डिबिया में से पारस पत्थर ले आया, किन्तु वह सोचने लगा – यदि यह पारस पत्थर है तो यह लोहे की डिबिया सोने की क्यों नहीं बनी? भक्त के इस संदेह को महात्मा ताड़ गए। उन्होंने डिबिया खाली तो उसमें पारस पत्थर एक कागज मे लपेटा हुआ था। सन्त ने कागज के आवरण पारस पत्थर से उतारा और ज्योंहि डिबिया से लगाया कि वह तत्काल सोने की बन गई। भक्त साश्चर्य इस घटना को देख रहा था। सन्त ने राज खोलते हुए कहा कि कागज का आवरण ही लोहे को सोना बनाने में बाधक था। वैसे ही आत्मा-परमात्मा के बीच मिथ्यात्व, माया आदि का आवरण पड़ा हुआ है। उसे दूर किए बिना आत्म-स्वरुप की अनुभूति नहीं हो सकती।

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