Short Stories

मुझे माफ करो

बापू के सेवा कार्यो को चलाने के लिए लोग तन-मन-धन से सहयोग देते थे। एक बार एक कट्टर धार्मिक सेठ ने बापू के चरणों में बड़ी धनराशि रख कर, निवेदन किया – मैं यह धनराशि इस शर्त पर भेंट कर रहा हूँ कि आप इसे हरिजनों और मुसलमानों के उपयोग में न लेंगे। इसके अलावा आप जैसा चाहे खर्च करें। बापू उछल पड़े, यह कैसे हो सकता है ? मेरे लिए तो सब बराबर हैं। सेठजी मैं इस धन को नहीं ले सकता, आपके उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई दूसरा महात्मा तलाश करें। सेठ नीची निगाह कर थैली उठाकर चलता बना । सिद्धान्त बड़ा होता है , धन नहीं ।

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