रोहिणी नदी के पानी के उपयोग पर शाक्यों और कोलियों में काफी वर्षों तक विवाद चला। बार बार काफी प्रयासों के बाद भी विवाद का हल नहीं निकल सका तो दोनों पक्षों के महाराजों में सैन्य बल के द्वारा हल निकालने की बात ठन गई। बात यहाँ तक बढ़ गई कि मारकाट और रक्तपात की नौबत आ गई।

इतने में अचानक गौतम बुद्ध ससंघ विहार करते हुए उधर पहुँच गए। भयानक दृश्य देखकर तथागत ने पूछाः-“किस बात का झगड़ा है? महाराजों!”।

रोहिणी नदी के पानी के उपयोग पर झगड़ा है, भन्ते।

“पानी का मूल्य क्या है? महाराजों!”

कुछ भी मूल्य नहीं है, भन्ते।

“क्षत्रियों के खून का मूल्य क्या है? महाराजों!”

उत्तर नदारद, दोनों पक्षों के महाराजों और उपस्थित सैनिकों की आँखें शर्म से नीची हो गई। तथागत की हित, मित, प्रिय रसभरी वाणी से ज्यों ही अमृत झरने लगा। दानों पक्षों मे विवेक जागा, हठ भागा और बिना किसी कड़वाहट के शालीनता के साथ तत्काल समझौता हो गया।

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