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संग्रह से दुख

राजा भोज सभा में बैठे थे। इतने में उनके सामने एक शहद की मक्खी आई। वह दोनों पांव मलकर सिर पर लगाने लगी। राजा ने यह देखकर उपस्थित विद्वानों से प्रश्न किया- “विज्ञों! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मक्खी कोई फरियाद लेकर आयी है। क्या आप में से कोई बता सकता है कि यह क्या फरियाद कर रही है?”
भोज का प्रश्न सुनकर सभी पण्डित आश्चर्य के झूले मे झूलने लगे। आखिर एक मनीषी ने कहा- “राजन्! वह मक्खी कुछ ही दिनों पहले मेरे पास आई और फरियाद करने लगी। मैंने कहा – तुम राजा के पास जाओ। वहां बराबर न्याय होगा। इसलिए आपके पास आई है।”
राजा- “विज्ञवर! यह तो बताओं इसकी क्या फरियाद है?”
विज्ञ “राजन्! यह मक्खी आपको चैतावनी देने आयी है कि महाराज भोज संग्रह करना बहुत बड़ा पाप है। संग्रहशील व्यक्ति को मेरी तरह दुःख का शिकार बनना ही पड़ता है। मैंने बड़ी निपुणता से मधु का संचय किया था। संग्रहीत मधु पर मैं मन ही मन गर्व करती थी। मैंने न तो उसका भक्षण किया और न किसी को दान दिया। अंत में लूटने वाले लूट ले गये और मैं हाथ मलती ही रह गई। संचय करने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं हो सकता, अतः हर एक को असंग्रह (अपरिग्रह) की भावना विकसित करनी चाहिए।”

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1 comment

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    vivekanand jain 13 June, 2014 at 16:59 Reply

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