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क्या मांस सबसे सस्ता है?

राजा श्रेणिक ने दरबार में प्रश्न उपस्थित किया कि – सहज सुलभ सस्ता खाद्य क्या है? क्योवृद्ध मंत्री ने उत्तर दिया, महाराजा अन्न ही उत्तम खाद्य है। दूसरे मंत्री ने कहा, महाराज अन्न पैदा करने में बहुत परिश्रम करना पड़ता है; बोना, सिंचाई करना, पकने तक प्रतीक्षा करना,  पशु-पक्षियों से रक्षा करना, काटना, निकालना, साफ करना आदि। महाराज, अन्न प्राप्त करना कष्ट व श्रम साध्य है – दूसरे मंत्री ने सुझाव दिया। सबसे सस्ता खाद्य मांस है। आखेट खेलने का आनन्द भी प्राप्त होता है, शिकार किये पशु को भूनों और खाओ, दरबार के अन्य मंत्री ने भी इसका समर्थन किया।

राजा श्रेणिक ने, महामंत्री अभय की और संकेत कर कहा, क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस प्रश्न का उत्तर बड़ा कठिन है महाराज, सोच के कुछ समय बाद दूंगा। मध्यरात्रि में महामंत्री अभय रथ पर पचास हजार स्वर्ण मुद्राएं, चिन्तित, वेदनाग्रस्त चेहरा लेकर मांस के संदर्भ में कथन करने वाले मंत्री जी के घर पहुँचे। महामंत्री गम्भीर वाणी में बोले – मंत्री जी, महाराज असाध्य रोग से ग्रस्त है, उनका जीवन खतरे में हैं। राजवैद्य ने बतलाया कि मनुष्य का हृदय का दो तोला मांस ला दें। औषधि के लिये अत्यन्त आवश्यक है, आप महाराज के परम हितैषी हैं, ये पचास हजार स्वर्ण मुद्रा ले लें और मुझे हृदय का दो तोला मांस दे दें।

महामंत्री जी ने हृदय का मांस क्या कह रहे है, आप! जीवित नहीं रहूँगा तो ये स्वर्ण मुद्रायें किस काम की? आप मेरे मित्र हैं, महाराज को कुछ न कहूँ  मुझसे इतनी ही मुद्राएं और ले लें, किसी अन्य को इस कार्य के लिये तैयार कर लें। किन्तु मुझे कृपया क्षमा कर दें।

महामंत्री अन्यान्य मंत्रियों को अलग-अलग प्रकार के प्रलोभन देते रहे किसी को एक लाख स्वर्ण मुद्राएं, किसी को आधा राज्य, किन्तु दो तोला मांस देने को कोई भी तैयार नहीं हुआ, जीना सभी चाहते हैं। दूसरे दिन दरबार में पुनः प्रश्न आया, महामंत्री बोल – महाराज, मांस बहुत मंहगा अप्राप्य है। दो तोला मांस नहीं मिल रहा है। स्वयं का मांस कोई नहीं देना चाहता, आश्चर्य, दूसरों का मांस लेना चाहता है। मासूम-बेजूबान-पशु-पक्षियों का ही मांस सस्ता है, क्योंकि यह प्राप्य है। क्या उन्हें जीने का अधिकार नही?

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