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राष्ट्र का चरित्र

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य में सर्वत्र-सुख शान्ति एवं ऐश्वर्य का साम्राज्य था। घी-दूध की नदी बहती थीं। लोग घरों में आजकल की तरह ताले नहीं लगाते थे। चीनी यात्री ने यह सब देखकर प्रश्न किया, “महाराज आपके राज्य मे सर्वत्र प्रजा सुखी समृद्धिशाली है। कहीं अन्याय और भ्रष्टाचार नहीं यह कैसे संभव है?”
सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने प्रधानमन्त्री आचार्य से भेंटकर उस यात्री को कारण ज्ञात करने को कहा। यात्री सुर्यास्त होने पर नगर से बाहर बनी कुटिया में प्रवेश कर आचार्य चाणक्य के संकेत से बिछे आसन पर बैठ गये। आचार्य चाणक्य ने अपना पहला दीपक बुझा दूसरा जला दिया। यह देख चीनी यात्री ने आश्चर्य चकित हो चाणक्य से प्रश्न किया- “आचार्य आपने पहला दीपक बुझाकर दूसरा क्यों जलाया, इसमें क्या रहस्य है,”
आचार्य चाणक्य ने सहज भाव से उत्तर दिया – महाशय, पहला दीपक राज्य के तेल से जल रहा था, मैं राज-काज में लगा था। यह दूसरा दीपक मेरा है, निजी तेल से जल रहा है। मैं आपसे निजी वार्ता कर रहा हूँ इसलिए अपना दीपक का प्रयोग कर रहा हूँ। यात्री उत्तर सुनकर अवाक् रह गया। उसे बिना पूछे अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। सत्य है जिस देश के प्रधानमन्त्री का चरित्र इतना उच्च हो, उस देश में अन्याय, भ्रष्टाचार क्यों उत्पन्न होगा?’

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