Short Stories

चन्दन का कोयला

चारों और त्राहिमाम लगातार दो वर्षो से वर्षा का नाम नहीं था। इस कारण दूर-दूर तक कहीं भी घास का तिनका तक नजर नहीं आता। इलाके में परिवार के परिवार अपने घरों को वीरान छोड़कर पलायन कर चुके थे। उसी इलाके में एक वृद्ध ब्राह्मण रहता था। वह लगातार दो वर्षो से पड़ने वाले सूखाग्रस्त अकाल को झेलने का आदी हो चुका था। उसने जंगल से लकड़ी एकत्रित कर उसका कोयला तैयारकर बेचने का निश्चय किया। यद्यपि वृदावस्था  में इतना शारीरिक श्रम शक्य नहीं था, फिर भी प्रकृति को यही मंजूर है, यह सोचकर कार्य करने लगा। एक दिन जैठ मास के तपती दोपहरी में वह लकड़ियां एक़ित्रत कर लौट रहा था कि उसे लू ने आ लपेटा और वह बेहोश होकर गिर गया। अचानक उसके प्रदेश का राजा अपने दल-बल सहित अपने प्रजाजनों के दुःखदर्दो को सुनने तथा उनके निवारणार्थ उधर से गुजरा। अचेत अवस्था में पथ मे गले में यज्ञोपवीत पड़ा देख ब्राह्मण जान उसका प्राथमिक उपचार किया। वृद्ध ब्राह्मण की परिस्थिति को जान राजा ने सोचा ब्राह्मण हमारा गुरु है। इसकी सेवा करना हमारा परम कर्त्तव्य है राजा ने आर्थिक संकटग्रस्त ब्राह्मण को दक्षिणा एवं आजीविका के प्रयोजन से  अपना  प्रिय चंदन का वन उसको दे डाला। ब्राह्मण ने चंदन  की लकड़ी का भी कोयला बनाकर बेचना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वइ चन्दन का वन गंजे सिर की तरह साफ हो गया। कुछ समय पश्चात् राजा जब पुनः भ्रमणार्थ वहाँ से निकला और अपने प्रिय चंदनवन की हालत देख बहुत दुखी हुआ। वृद्ध ब्राह्मण को शिक्षा देने की गरज से राजा ने उस ब्राहमण को छोटा सा लकड़ी का टुकड़ा बेचकर आने को कहा । जब ब्राहमण ने लकड़ी के छोटे से टुकडे़ की कीमत पाई तो फूट-फूटकर रो पड़ा और पछताने लगा, परन्तु अब क्या हो सकता था। इसी प्रकार हमारे जीवन के अनमोल क्षण विषय कषाय की  अग्नि में जल रहे हैं ।

यही स्थिति हमारी रही तो हमें भी उस ब्राह्मण की भांति रोना पछताना ही पड़ेगा ।

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