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मृत्यु महोत्सव का स्वागत

यशोधर राजा के राज में एक सत्यनिष्ठ स्पष्टवादी लेखक और कवि रहता था। यदा कदा वह राजा के गलत और मनमाने कार्यों के विरुद्ध टिप्पणियां भी कर दिया करता था। इसलिए राजा उससे बहुत चिढ़ता था, परन्तु वह कवि जनता में अपनी स्पष्टवादिता एवं सत्य बात को कह देने के लिए अत्यंत प्रसिद्ध था। सभी उसके इस गुण से प्रभावित थे।

कुछ समय पश्चात् कुछ ऐसा संयोग बना कि वह व्यक्ति एक मामले में फंस गया या फंसा दिया गया। राजा के सम्मुख उसे पेश किया गया। उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। राजा समझ भी गया कि वह निर्दोष है, परन्तु राजा ने उसके द्वारा अपने विरुद्ध की गई टिप्पणियों को मन में रखकर उसे मृत्युदण्ड दे दिया। और उसे घुट घुट कर मरता हुआ देखने के लिए उसकी मृत्यु ठीक छह महीने बाद निश्चित कर दी। राजा ने सोचा कि अव वह उसे तिल तिलकर  घुट घुट कर मरते हुए देखेगा।

परन्तु यह क्या? राजा को दूसरे दिन समाचार मिला कि उस व्यक्ति के पास जो लोग संवेदना प्रकट करने आये थे, उनसे वह हंस हंस कर बातें कर रहा था कि बोलो तुम्हें अपनी मृत्यु का दिन मालूम है? सभी कहते “नहीं।” फिर वह ठहाका लगाकर हंसता और कहता, “देखो तुम्हें किसी को भी अपनी मौत का दिन नहीं मालूम है परन्तु मैं कितना भाग्यशाली हूँ  और राजा ने मेरे ऊपर कितना उपकार  किया है, मेरी मृत्यु का दिन निश्चित कर दिया है।

राजा के पास इस प्रकार के समाचार प्रायः पहुँचते, जिनमें वह लोगों से कहता कि तुम्हें किसी को भी अपनी मृत्यु का दिन नहीं मालूम, इसलिए तुम सब गाफिल हो। नींद में सोए हुए हो। मैं भी गाफिल  था और गहरी निद्रा में मग्न था परन्तु राजा धन्य है जिसने मेरी मृत्यु का दिन निश्चित कर मुझे जगा दिया, मुझे चैतन्य कर दिया। अरे मृत्यु तो सबको ही आनी है परन्तु मैं उन सब से अलग हूँ, यहाँ तक कि राजा से भी अलग हूँ क्योंकि किसी को अपनी मृत्यु का दिन नहीं मालूम है, परन्तु मुझे मालूम है।

इस प्रकार वह हर मृत्यु की ओर बढ़ रहे दिन में और अधिक आनन्द और खुशी के साथ बिताता। राजा को जब यह पता चला कि वह अब घुटने और चिन्तित होने के स्थान पर खुश हो रहा है तो वह आश्चर्यचकित रह गया। धीरे धीरे करके जब मृत्यु दण्ड का दिन अत्यन्त निकट आ गया तो उसने मृत्यु से पूर्व के तीन दिनों में मृत्यु महोत्सव मनाने की घोषणा कर दी। मृत्यु महोत्सव के दिनों मे तो वह अत्यन्त आह्लादित, उत्साहित और बेहद प्रसन्न नजर आ रहा था और सभी को हंस हंस कर अपनी नवीन रचनायें सुनाता था। जिसमें वह राजा का आभार प्रकट करना कभी नहीं भूलता था। और अन्त में मृत्यु की निश्चित तिथि भी आ पहँची। उस दिन भी वह अत्यन्त शांत और प्रसन्न चित्त था। मृत्यु दण्ड से कुछ समय पूर्व राजा उसके पास पहुँचा और आँखों में अँासू भरकर बोला, “सचमुच तुम मृत्युंजयी हो, धन्य हो, तुमने एक राजा को परास्त कर दिया है और हमारे अहं को भी परास्त कर दिया, तुमने तो मृत्यु को भी परास्त कर दिया।” राजा ने अपनी गलती का अहसास करते हुए उसके मृत्यु दण्ड को निरस्त कर दिया।

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