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भाव हिंसा का फल

मध्यलोक के अंतिम समुद्र में एक राघव मच्छ एक हजार योजन लम्बा रहता है। उसकी आँखों की पलकों पर एक तंदुल मच्छ बैठा रहता है। राघव मच्छ जब मुँह खोलता है तो अनेकों समुद्र में रहने वाले छोटे छोटे प्राणी उसके मुँह में चले जाते है और उनमें से कोई कान, कोई नाक और कोई मुख ही से बाहर निकल आते हैं। तंदुल मच्छ सोचता यह राघव मच्छ कितना मूर्ख है?  इतने प्राणी इसके मुँह में अनायास आ जाते हैं और यह उन्हें छोड़ देता है। मैं होता  तो मैं इन सबको अपना भोजन बना लेता। इन दुर्भावों के फल से तंदुल मच्छ सातवें नरक में चला जाता है।

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