Short Stories

ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती

मैं बेशक परस्त्री-लंपट न था परन्तु स्व-स्त्री में अति-आसक्त था। उसी से अंतिम समय में प्रभु का नाम मुँह से आने के बजाय मेरी पटरानी कुरुमती का नाम पुकारते पुकारते ही मेरा निधन हो गया और मैं सातवी नरक में धकेल दिया गया। वहाँ की भंयकर यातनाओं के बीच रह कर मैं आज भी छठी नरक मे रह रही उसी कुरुमती को ही पुकार रहा हूँ। न जाने और कितने ही नरकों का पाप मैं भोग रहा हूँ। वास्तव मे नरक की यातनाओं से भी ज्यादा वेदना की पीड़ा को आज भयंकर तरीके से अनुभव कर रहा हूँ। मेरा संदेश है विषयाभिलाषा नरक में उतरने की “सीढ़ी” है।

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