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श्रेष्ट साधक कौन ?

एक बार मुनिराज से उनके एक शिष्य ने प्रश्न किया-भगवन्,श्रेष्ट साधक के क्या लक्षण होते हैं? मुनिराज ने प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया-चूहे चार प्रकार के होते हैं एक वे , जो स्वयं खोदकर बिल बनाते हैं और लेकिन उसमें रहते नहीं, दूसरे वे, जो बिल में रहते है पर स्वयं नहीं खोदते। तीसरे वे जो स्वयं बिल भी बनाते और उसमें रहते भी हैं। चौथे वे, जो न तो बिल बनाते हैं और ना ही बिल में रहते हैं। इसी प्रकार साधक भी चार भागों में बँाटे जा सकते हें, एक वह जो शास्त्र पढ़ते तो है लेकिन उसे जीवन में नहीं उतारते। दूसरे वे, जो शास्त्र ज्ञानी न होकर भी जीवन में सिद्धान्त का साक्षात्कार करते हैं। तीसरे वे, जो शास्त्र ज्ञान भी प्राप्त करते हैं और सत्य का स्वयं अनुभव करते हैं। चौथे वे, जो न तो शास्त्र ज्ञान का अभ्यास करते हैं और न सत्य आचरण करते हैं। अब तुम ही निर्णय करो कि श्रेष्ट साधक कौन है?

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