Short Stories

आत्म विश्वास

भरतपुर नरेश महाराज रणजीतसिंह सन! 1805 की जनवरी में अंग्रेजो से युद्ध के समय अपने किले की दीवारों पर निर्भीक हो सेना का निरीक्षण कर रहे थे। उनके सैनिकों ने कहा- “अन्नदाता शत्रुओं की तोपे ओले की तरह गोले बरसा रही हैं, आप यहाँ न घूमें।” महाराज ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया- “भैया! जिसकी आ गई है, उसे कोई बचा नहीं सकता और जिसकी आयु शेष है, उसे दुनिया की कोई शक्ति नहीं मार सकती। यह सिद्धान्त अटल है, तब फिर डर कैसा”?

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