Short Stories

जब बेड़िया वरदान बन गयी !

चन्दना का सौन्दर्य उसे अभिशाप बन गया था। इसलिये उसका हरण हुआ एवं शील की रक्षा के लिये उसे अनेक दुराचारियों से संघर्ष करना पड़ा। वह वेश्या के यहाँ भी बेची गई, सौभाग्य से कौसाम्बी नगरी के सेठ वृषभानु उसे अपनी पुत्री बनाकर अपने घर पर ले आये। किन्तु उसकी सेठानी ने भ्रम से उसे सौत मानकर सेठ की अनुपस्थिति में चन्दना का सिर मुड़ाकर उसे सांकलों से बन्धवाकर  तलघर में डाल दिया। खाने के लिए उबला हुआ कोदों दिया जाने लगा। वह निरन्तर भगवान के घ्यान में तल्लीन रहने लगी।  विवेकी प्राणी तो सम्पत्ति या विपत्ति की अवस्था में अपना सन्तुलन बनाये रखता है। चन्दना भी उन्हीं विवेकियों में से थी। तीर्थंकर महावीर की माता त्रिषला की सहोदरा भगिनी जो थी। उस दिन उसके कर्ण कुहरों में हर्षोल्लास की कुछ गगनभेदी ध्वनियां सुनाई दी। धीरे-धीरे ध्वनियां निकट आती जा रहीं थी। अपार जनमेदिनी उमड़ नही थी। जनसमूह महावीर एवं वर्द्धमान की जयकार का तुमुलनाद कर रहा था। अब चन्दना का मन महावीर के दर्शन करने को उमड़ पड़ा। उसने सोचा – अवश्य वर्द्धमान चर्या को निकले हैं। पर मैं उनको आहार कैसे दे सकूंगी? मेरे पास पूरे वस्त्र भी नहीं, आहार के योग्य सुन्दर भोजन भी नहीं। सांकलो से जकड़ी पड़ी हूँ। तभी मुनिवर वर्द्धमान सामने आ चुके थे। उसका मन आहार दान देने को लिए बेताब हो रहा था इसलिए वह उठी। सांकले तड़ातड़ टूट पड़ी। उसने पड़गाहन कर सूप में रखे कोदों का ही भोजन देने का निर्णय कर लिया था। वर्द्धमान की विधि और प्रतिज्ञा की पूर्ति वहीं पर हो गई थी, अतएव उन्होंने उबाले गए कोदां का भोजन स्वीकार कर लिया। एक बार फिर जयकार का तुमुलनाद आकाश में ध्वनित हो उठा। देवों ने पंचाश्चर्य किए। चन्दना धन्य हो गई। सेठानी ने चन्दना से क्षमा याचना की। चन्दना ने कहा- माताजी! आपकी कृपा से ही तो आज तीर्थंकर का आहार हुआ है। यही तो भगवान की प्रतिज्ञा थी। चन्दना ने आर्यिका के व्रत स्वीकार कर अपना कल्याण मार्ग प्रशस्त किया। महावीर के समोसरण मे चन्दना आर्यिका संघ की प्रमुख आर्यिका बन गई।

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