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बंध, मोक्ष परिणामों से ही

प्राचीनकाल मे एक नगर मे एक दिगम्बर मुनि आये थे। वहाँ मुनि के लिये अन्य योग्य स्थान न समझकर दैवल कुम्हार ने मुनि को धर्मशाला मे यथा स्थान ठहरा दिया। दूसरे दिन जब धर्मिल नाई धर्मशाला मे आया तो उसने मुनि को धर्मशाला से निकालकर अन्य साधु को ठहरा दिया। अगले दिन जब दैवल धर्मशाला मे गया तो वहाँ मुनिराज को नहीं देखकर बहुत दुखी हुआ। दैवल को धर्मिल पर क्रोध आया और उसे भला बुरा कहा कि उसने दिगम्बर मुनिराज को निकालकर अच्छा कार्य नहीं किया है। दोनों में विवाद इतना बढ़ गया कि वे आपस मे युद्ध करने लगे। अन्त में दोनों की मृत्यु हो गई। दैवल मरकर जंगली सुअर और धर्मिल बाघ हुआ। दैवयोग से दो मुनिराज विहार करते हुए जिस गुफा में सुअर रहता था, उसके पास शिला पर ध्यान लगाकर बैठ गये। प्रातःकाल सुअर अपनी गुफा से बाहर आया। दोनों मुनियों को देखते ही उसे जाति स्मरण हो गया। जाति स्मरण के पश्चात् सुअर मुनिराजों के पास बैठ गया मुनियों ने उसे अहिंसा व्रत का उपदेश दिया, सुअर ने व्रत लिया कि वह भविष्य मे किसी भी जीव की हत्या नहीं करेगा। वह मुनिराजों के पास ही बैठा रहा और दोनों की रक्षा करता रहा। दूसरी गुफा में धर्मिल का जीव बाघ पैदा हुआ था। शिकार की खोज मे वह, जहाँ दो मुनिराज बैठे हुये थे, आया। वहाँ उसने मुनियों के समीप सुअर को बैठा हुआ देखा। बाघ ज्योंही दोनों मुनियों पर झपटा, इससे पहले सुअर बाघ के ऊपर क्रोधित होकर झपट पड़ा। सुअर मुनिराजों का रक्षक और बाघ मुनियों का भक्षक था। इन दोनों मे ंलड़ाई होने लगी। अन्त मे सुअर बाघ लड़ते हुए इतने ज्यादा घायल हो गये कि वहीं पर दोनों ने अपने प्राण छोड़ दिये और मृत्यु को प्राप्त हुए। सुअर जो दोनों मुनियों का रक्षक था, अभयदान देनेवाला था, वह मरकर सौधर्म स्वर्ग में अनेक ऋद्धियों को प्राप्त करने वाला देव उत्पन्न हुआ। मुनियों का भक्षण करने वाला बाघ का जीव मरकर नरक गया। जहाँ वह लम्बें समय तब नरक का दुख भोगता रहा। यही संसार का क्रम है। एक प्राणी अहिंसा के प्रभाव से स्वर्ग गया और दूसरा हिंसा के कारण नरक गया । प्रत्येक प्राणी को चाहिए कि वह सब जीवो की रक्षा करे, अभय दान देवे ताकि उसके फल से उसे शुभ गति मिले । स्व और पर की रक्षा करने वाला “अहिंसा परम धर्म” है।

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