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विश्व हित को लिये बलिदान

महाराज जयपुर ने सुना, आज जनता ने रोष में आकर एक अंग्रेज अधिकारी को सपरिवार मौत के घाट उतार दिया। राजा ने भावी अनिष्ट की आशंका से सैकडों विप्लवकारियों को मृत्युदण्ड देने की घोषणा की।

“आज सैकड़ों मनुष्य सूली पर चढ़ा दिये जायेंगे। उनमें कुछ अपराधी तथा कुछ निरपराध भी। मैं राज्य का दीवान हूँ, चाहूँ तो सबको बचा सकता हूँ।” यह सोचकर दीवान अमरचन्द जी ने कहा – “महाराज! अपराध तो सिर्फ मेरा ही है, मैंने ही यह सब किया है। अंग्रेज की मौत का मैं ही उत्तरदायी हूँ।” और दीवानजी ने दूसरों की रक्षा के लिये हँसते-हँसते अपना बलिदान चढ़ा दिया। मरना भला है उसका, जो अपने लिये जिये। जीता है वह जो मर चुका, संसार के लिये।

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