Short Stories

अपूर्व दृढ़ता

बाबा लालमनदास जी सं॰ 1956 में दिल्ली के कुछ  धर्मबन्धुओं के साथ सम्मेदशिखर जी की यात्रा को गये थे। वहां मधुवन के जंगलों में वे एक शिला पर जाकर सामायिक करने बैठ गये। दुर्भाग्य से वहाँ एक सर्प ने उनके पैर में डस लिया।

वन्दना में अकस्मात् विघ्न आया देखकर बाबा जी ने प्रतिज्ञा की कि जब तक सर्प स्वयं आकर विष  नहीं खींच लेगा, तब तक मैं यहीं बैठकर ध्यान करूंगा तथा आहार विहार का भी त्याग। बाबाजी दो दिन तक वहीं अचल बैठे रहे। तीसरे दिन सर्प ने स्वयं आकर विष खींच लिया। तब उसी समय स्नानादि कर क्षेत्र की वन्दना कर आपने जल ग्रहण किया।

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