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अज्ञान अन्धेरे में ही अनर्थ होते हैं

आज वह नाविक सूर्य निकलने के पूर्व ही अपनी नाव को पास नदी किनारे पहुँच गया। अन्धेरे में उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। चौक कर उसने देखा-पत्थरों से भरी हुई एक थैली पड़ी थी। उसने वह पत्थर की पोटली एक तरफ रख दी और सूरज निकलने की प्रतीक्षा करने लगा। खाली बैठे-बैठे वह उस थैली ऐ एक-एक पत्थर निकाल कर धीरे-धीरे नदी में फेंकने लगा। सूरज निकलने तक उसने उस थैली के सारे पत्थर फेंक दिये थें । सिर्फ एक पत्थर उसक हाथ मे रह गया था। सूरज के प्रकाश में देखते ही उसके हृदय की धड़कन बन्द सी होने लगी, सांस रुक गयी, वह बुरी तरह घबरा उठा था। उसने जिन्हें पत्थर समझकर फेंक दिया था, वे हीरे जवाहरात थे। वह रोने चिल्लाने लगा। उसे इतनी सम्पत्ति मिल गई थी कि कई जन्मों के लिए काफी थी किन्तु ’अब पछताये होत क्या चिड़िया चुग गई खेत।’अन्धेरे में अनजाने मे उसने उस सारी सम्पत्ति को पत्थर समझकर फेंक दिया था। लेकिन वह नाविक फिर भी भाग्यशाली था क्योंकि अन्तिम रत्न फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसने जान लिया था उसके हाथ मे हीरा है।
जीव अनेक धारण कर अज्ञान के अन्धेरे मे सभ्यज्ञान से प्राप्त होने वाले सुख-शान्ति के हीरे व्यर्थ फेंकता रहा है। यदि एक बार भी ज्ञान सूर्य के प्रकाश में रत्नत्रय निधि को देख होता, सम्हाला होता तो यह प्राणी अवश्य दुख से छटकारा पाकर शाश्वत सुख पा गया होता किन्तु अज्ञान के अन्धेरे मे इन आँखों से सिर्फ बाह्य वस्तु ही दिखती हैं। अन्तर का अपना ज्ञान दर्शन सुख गुण कहाँ दिखता हैं। वह सुख है अन्तर में और ढूंढ़े बाहर तो कहाँ से मिलेगा? सम्यज्ञान के प्रकाश मे ही वह दिख् या मिल सकता है। कहा है- ज्ञान समान न आन जगत में सुख को कारण ।यह परमामृत जन्म जरा मृत्यु रोग निवारण।

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