Short Stories

मानव जन्म कब से ?

एक विवेकी विरागी बालक छोटीसी आयु में महाव्रत लेकर मुनि बन गया था। एक दिन वे आहार के निमित्त एक सेठ जी के यहाँ पहुँचे। निरन्तराय आहार होने के बाद सेठ जी की विदुषी पुत्रवधु ने मुनिराज से पूछा-स्वामिन्! इतने सवेरे सवेरे कैसे ?

मुनिराज- समय की खबर नहीं थी।

फिर मुनिराज ने कहा – ’बेटी, तुम्हारी आयु कितनी है’ – ‘दस वर्ष की! ’,  ‘तुम्हारे पति की?’ –  ‘आठ वर्ष की’।

’श्वसुर?’ – ‘वह तो अभी पालने में झूल रहा है।’, ‘और सास?’ –  ‘उनका अभी जन्म नहीं हुआ।’

बेटी! ताजा भोजन करती हो या बासा।

’स्वामी! अभी तक सब बासा खा रहे हैं।

यह चर्चा जब सास ससुर ने सुनी तो वे आग बबूला होकर बोले-’बहु! यह क्या पागलपन की बकवास कर रही है?’

मुनिराज ने कहा – ‘सेठ जी तुम्हारी पुत्रबधु तो बड़ी विदुषी है। उसने बड़ी विद्वत्तापूर्ण चर्चा की है।’

‘गुरुदेव! इसके पागलपन को आप विद्वत्ता कह रहे हैं ?’

’हाँ, सेठ जी! इसने पूछा था कि  इतने सबेरे-2 कैसे? इसका मतलब था कि इतनी छोटी सी आयु में आपने दीक्षा क्यों ले ली है? तब मैंनें उत्तर दिया था कि मेरे पास काल कब आ जाये इसका कोई प्रमाण पत्र नहीं है।’

फिर इसने जिसकी जितनी आयु बतलाई है, उसका मतलब है कि जिसको जब से धर्मरुचि हुई तभी से उसका वास्तविक मानव जीवन है, धर्मशून्य जीवन तो पशुजीवन है। अन्त में इसने उत्तर दिया था कि सब बासा खाते हैं। इसका अर्थ है कि सेठ सा! आप पूर्व पुण्य की कमाई खा रहे हैं। नया तो कोई धर्म कार्य या पुण्यकार्य कर नहीं रहे तो सब बासा भोजन हुआ। सेठ जी पुत्रवधु की बुद्धि पर बहुत खुश हुए।

Share:

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *